सर्वेश तिवारी श्रीमुख : एक बच्ची की चीख और पूरे समाज की खामोशी

राजस्थान की उस तेरह साल की बच्ची के साथ हुई घटना इतनी भयावह है कि एक सामान्य आदमी सोच कर सुन्न पड़ जाय। आप ऐसी दरिंदगी पर क्या ही बोल पाएंगे? कानून, न्याय, सजा… इन बातों का कोई मतलब भी है क्या? उन अपराधियों को दी गई कोई भी सजा क्या उस बच्ची के परिवार को संतोष दे पाएगी? क्या एक नागरिक के रूप में हम ही संतोष कर पाएंगे कि चलो हो गया? नहीं। उसकी पीड़ा के बारे में सोच कर ही भय से रोंगटे खड़े हो जा रहे हैं…
यह हमारा देश है। यहीं जीना है हमें। इन्हीं सड़कों पर देश की करोड़ों बच्चियां रोज निकलती हैं, उसी बच्ची की तरह जरूरत पड़ने पर घर, स्कूल, मार्केट, कोचिंग जाने के लिए रिक्शा रोक बैठ जाती हैं? ऐसे में कौन सुरक्षित है?
सरकार होटल पर बुलडोजर चला रही है, अपराधियों की सड़क पर परेड करा कर पीटा जा रहा है, उनमें से कुछ को सजा भी होगी। पर क्या तब भी संतोष किया जा सकेगा? अभी तो यह भी संभव है कि कुछ भारतीय कानून व्यवस्था को अपनी बिचली उंगली दिखाते हुए छूट भी जाएं।
मैं सोच रहा हूं, पांच दिन तक उसके साथ हो रहे अपराध में एक के बाद एक जुड़ते लोगो में किसी को भी दया नहीं आई? किसी को भी अपनी बहन, बेटी, मां की याद नहीं आई? इतना कसाईपना कम से कम भारतीयों में तो नहीं था। कहां से आ रहा है यह?
क्या रोज होती घटनाओं के बाद भी इस देश में कहीं इस बात पर चर्चा शुरू हो पाई है कि भारत में तेजी से बढ़ती इस बर्बर बीमारी का कारण क्या है? इतनी क्रूरता, इतनी बर्बरता आम लोगों के स्वभाव में आ कहां से रही है? नहीं। इस पर कहीं चर्चा नहीं। क्यों? क्या कहीं बाजार के आगे सभी हार तो नहीं गए?
आप बीस साल पहले की स्थिति से आज की तुलना कर लीजिए, आप पाएंगे कि यह बर्बरता तब कहीं नहीं थी। आज है और तेजी से बढ़ रही है। लगभग रोज ही ऐसी एक न एक घटना सामने आती ही है जिसमें बच्चियों के विरुद्ध इसी तरह का बर्बर व्यवहार हुआ होता है। तेजी से बढ़ रही इस बीमारी के जड़ में कुछ तो कारण होगा?
अभी आज ही बंगाल के एक ऐसे ही अपराधी को पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया है। पुलिस अधितम यही तो कर सकती है। क्या लगता है, इससे इस बीमारी पर रोक लगेगी? मुझे लगता है कि नहीं लगेगी। यह देश जबतक इस बीमारी का मूल कारण नहीं ढूंढता, तबतक नहीं लगेगी…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *