मधुसूदन उपाध्याय ; नेतृत्व-विहीन पूर्वांचल : पिछड़ेपन और जातीय विद्वेष की राजनीतिक प्रयोगशाला

दो छोटी सत्य कथाओं से शुरू करता हूं। पहली कि बिहार बॉर्डर पर यूपी के एक गांव में एक नवयुवक है। विवाह की उम्र हो गयी है। बाप सामाजिक व्यक्ति हैं तो हर हफ़्ते रिश्ते आ रहे हैं। लड़का हर बार मना कर देता है। खीझ कर बाप चिल्लाते हैं कि कोई और पसंद है तो बता दे। लड़का, रूआंसा लड़का! दबी ज़बान में कहता है कि उसे लड़कियां नहीं पसंद। फिर खुलासा होता है कि उसे कोई ‘लड़का’ पसंद है। बाप बड़े क्रोधित। पर जैसे ही लड़के का नाम पता चलता है गुस्सा और खीझ कम हो जाती है कि चलो है तो अपनी बिरादरी का। इस कहानी में जान बूझ कर नाम और बिरादरी का ज़िक्र नहीं।

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दूसरी कहानी सुनिए कि पूर्वांचल के एक छोटे से चौराहे पर। सुबह सुबह भीड़ कम है। सोलह सत्रह साल का एक लड़का सायकिल पर घर का राशन लादे जा रहा है। संभवतः गेहूं पिसवाने गया हो। एक लोडर गाड़ी ठोकर मार गयी। लड़का लहूलुहान। तड़प रहा है। उधर से कुछ नौजवान गुजर रहे हैं। वह लड़के को पहचानते हैं। सिर्फ इसलिए मदद नहीं करते कि उसकी जाति अलग। रोइए, कलपते रहिए, तड़पते रहिए।

सच यही कि इस देश को सोशल इंजीनियरिंग, सामाजिक न्याय और जातिगत समीकरण वाली राजनीति के नाम पर बधिया कर दिया गया है।

पूर्वांचल में ब्राह्मण समाज है, क्षत्रिय समाज है, यादव समाज है, दलित समाज है। घटिया नामकरण। कोई एक जाति कैसे समाज हो सकती है?
समाज तो सबसे मिलकर बनता है न?

दलित साहित्य, राजभर साहित्य, मुसहर साहित्य.. साहित्य की भी जाति हो गयी। वाह

मैं पूर्वांचल से हूं। पूर्वांचल मेरा है। अपनी दही को खट्टा कौन कहे। परन्तु “खुद के अँगना में कीचड़, अउर दुनिया के सफाई पर प्रवचन।” यह भी तो ठीक नहीं। पूर्वांचल बड़ा विचित्र भूभाग है। यहाँ आदमी पैदा होते ही दो चीज़ें सीख जाता है—पहली, अपनी जाति और दूसरा अपना दुःख। बाकी शिक्षा-दीक्षा तो बाद की बात है। गंगा-घाघरा के दोआब में पसरा यह इलाका सदियों से इतना इतिहास ढो रहा है कि अब उसकी कमर धनुष की तरह टेढ़ी हो चुकी है। मगर विडम्बना देखिए कि जहाँ बुद्ध ने करुणा का उपदेश दिया, कबीर ने निर्भय होकर पाखंड को लतियाया, वहीं आज राजनीति जाति की भुजिया तलकर परोसती है और जनता उसे लोकतंत्र का प्रसाद समझकर खा जाती है।
पूर्वांचल का इतिहास भी किसी बूढ़े बैल की तरह है—काम बहुत किया, पर चारा हमेशा कम मिला। बनारस, गोरखपुर, आजमगढ़, बलिया, मऊ, गाजीपुर, देवरिया, जौनपुर—इन जिलों के नाम सुनते ही लगता है कि संस्कृति अभी खड़ाऊँ पहनकर खेत की मेड़ पर टहल रही होगी। लेकिन जरा भीतर घुसिए तो मालूम पड़ेगा कि संस्कृति अब सरकारी योजना की तरह फाइलों में रहती है और गाँव का आदमी आज भी ‘विकास’ को किसी तहसील के बाबू का रिश्तेदार समझता है, जिससे बिना सिफारिश के भेंट नहीं हो सकती।

अंग्रेज जब आए तो उन्होंने पूर्वांचल को अनाज की कोठरी और मजदूरों की खान समझा। नील, अफीम और लगान की ऐसी चकरी चली कि किसान की पीठ बैलगाड़ी के पहिए जैसी हो गई। 1857 के विद्रोह में बलिया और गाजीपुर के लोगों ने जान हथेली पर रखी, मगर आज़ादी के बाद वही इलाका सरकारी नक्शे में ‘पिछड़ा क्षेत्र’ लिखकर किनारे धर दिया गया। जैसे घर की बूढ़ी दादी, जिसे पूजा तो जाता है, पर उसकी दवा कोई नहीं लाता।

फिर आई लोकतंत्र की बरसात। लोग समझे थे कि अब खेत में धान उगेगा, स्कूल खुलेंगे, कारखाने लगेंगे। मगर राजनीति ने ऐसा खेल दिखाया कि पूरा इलाका जातियों के अखाड़े में बदल गया। कोई राजपूत सम्मेलन कर रहा है, कोई यादव महासभा, कोई ब्राह्मण चेतना मंच, कोई निषाद अधिकार यात्रा। जनता का हाल वैसा ही रहा जैसे मेले में खोए बच्चे का होता है—हर आदमी उसे अपना बताता है, मगर घर कोई नहीं ले जाता।

पूर्वांचल में नेता पैदा नहीं होते, गुट पैदा होते हैं। यहाँ राजनीति किसी सिद्धांत पर नहीं, बल्कि बिरादरी के खूँटे पर बंधी भैंस की तरह चलती है। गाँव का आदमी वोट देने नहीं जाता, वह जातीय उपस्थिति दर्ज कराने जाता है। लोकतंत्र यहाँ चुनाव कम, गोत्र सम्मेलन अधिक लगता है। चौपाल पर बहस ऐसे होती है मानो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक चल रही हो, जबकि असलियत यह है कि गाँव के स्कूल में मास्टर महीनों से नहीं आया।

यहाँ का राजनीतिक नेतृत्व भी बड़ा अनोखा है। कोई नेता दिल्ली पहुँचते ही अपने जिले को ऐसे भूल जाता है जैसे शहर जाकर लड़का अपनी बूढ़ी माँ को भूल जाता है। सड़कें आज भी गड्ढों में निवास करती हैं। अस्पतालों में डॉक्टर ऐसे मिलते हैं जैसे सावन में धूप। नौजवान या तो प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग में खप रहा है, या मुंबई-दिल्ली में पसीना बहा रहा है। पूर्वांचल का सबसे बड़ा उद्योग आज भी पलायन है। यहाँ के लड़के ट्रेन में लदकर जाते हैं और गाँव में सिर्फ उनकी बुजुर्ग माँओं की आँखें बची रह जाती हैं।

गोरखपुर का इंसेफेलाइटिस वर्षों तक बच्चों को निगलता रहा। हर साल अखबारों में खबर छपती—“इतने बच्चे मरे।” सरकारें आतीं, भाषण देतीं, जांच बैठती, फिर सब चुप। जैसे किसी ने तालाब में कंकड़ फेंका हो और लहरें थोड़ी देर बाद शांत हो गई हों। विकास का पूरा मॉडल ऐसा रहा कि शहरों में फ्लाईओवर उगते रहे और गाँवों में हैंडपंप सूखते रहे।

पूर्वांचल का समाज भी बड़ा करुण-हास्यास्पद है। आदमी गरीबी से कम, प्रतिष्ठा से अधिक मरता है। खेत गिरवी रख देगा, मगर बारात में डीजे और पचास किलो पनीर जरूर चढ़ाएगा। जातीय श्रेष्ठता का आलम यह है कि खुद के घर में चूल्हा ठंडा हो, फिर भी दूसरे की जाति पर टिप्पणी करने का उत्साह कम नहीं होता। मानो सामाजिक सम्मान नहीं, पुरखों का लंगोट बचाना हो।
यहाँ विद्वेष की खेती खूब फलती है। चुनाव आते ही नेता लोग गाँव में वैसे उतरते हैं जैसे बरसात में मेंढक। कोई कहता—“आपकी जाति खतरे में है।” दूसरा कहता—“आपका सम्मान छीना जा रहा है।” तीसरा घोषणा करता—“अबकी आपकी सरकार।” जनता भी गदहा-नहाए उत्साह से नारे लगाने लगती है। बाद में वही नेता राजधानी जाकर एसी कमरे में बैठकर सब जातियों का संयुक्त शोषण करता है।

पूर्वांचल की त्रासदी यह नहीं कि यहाँ गरीबी है। गरीबी तो राजस्थान में भी है, बुंदेलखंड में भी। असली त्रासदी यह है कि यहाँ सामूहिक चेतना को जानबूझकर खंडित रखा गया। जनता को नागरिक नहीं, जातीय वोटर बनाया गया। विश्वविद्यालयों की जगह जातीय महासम्मेलन मजबूत हुए। पुस्तकालयों से ज्यादा भीड़ पंचायत चुनाव में जुटी। और राजनीति ने इस विघटन को खाद-पानी देकर इतना पुष्ट किया कि आदमी पहले जाति बन गया, बाद में इंसान।

विडम्बना देखिए—जिस भूभाग ने कबीर, राहुल सांकृत्यायन, प्रेमचंद और भिखारी ठाकुर जैसी चेतनाएँ दीं, वहीं आज विचारधारा का स्थान व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय ने ले लिया। गाँव का लड़का इतिहास कम, अफवाह अधिक जानता है। ज्ञान की जगह जुमला, विमर्श की जगह वैमनस्य और नेतृत्व की जगह ठेकेदारी ने ले ली।

पूर्वांचल का नेतृत्व इसलिए विहीन नहीं है कि यहाँ योग्य लोग नहीं हुए। बल्कि इसलिए कि यहाँ योग्य आदमी या तो किनारे कर दिया जाता है, या राजनीति की दलदल में फँसकर वही बन जाता है जिससे लड़ने निकला था। यहाँ व्यवस्था किसी पोखरे के उस काईदार पानी जैसी है जिसमें नया उतरने वाला भी थोड़ी देर बाद हरा हो जाता है।
फिर भी यह इलाका पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। यहाँ अभी भी भोर में गंगा किनारे आरती होती है, खेतों में पुरवैया चलती है, लोकगीतों में करुणा बची हुई है। गाँव की बूढ़ी औरत आज भी तुलसी चौरे पर दीप रखती है और मन ही मन चाहती है कि उसका पोता शहर जाकर अफसर बने। यही आशा पूर्वांचल की असली पूँजी है।
लेकिन जब तक राजनीति जातीय विद्वेष की भट्ठी जलाकर रोटियाँ सेंकती रहेगी, तब तक यह इलाका नेतृत्व नहीं, ठेकेदार पैदा करेगा। और जनता हर चुनाव में उसी तरह ठगी जाती रहेगी जैसे हाट में भोला किसान नकली बीज खरीदकर लौटता है।

पूर्वांचल आज भी इंतज़ार में है—किसी ऐसे नेतृत्व के, जो जाति की खपरैल से ऊपर उठकर समाज की छत बना सके। मगर फिलहाल हालत यह है कि यहाँ हर आदमी नेता बनना चाहता है, पर कोई जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहता। लोकतंत्र का बैलगाड़ी रूपी पहिया कीचड़ में धँसा है और पूरा समाज उसे धक्का देने के बजाय जाति पूछ रहा है।
यही पूर्वांचल है—जहाँ इतिहास बहुत है, मगर भविष्य अभी भी बनिए की बही में उधार पड़ा है।

पूर्वांचल को अगर भारत माता की देह मान लिया जाए, तो देवरिया, बलिया, कुशीनगर, मऊ, गाजीपुर और गोरखपुर उसका वह इलाका हैं जहाँ लोकतंत्र गमछा डालकर खैनी मलता है, और विकास हर चुनाव में “बस आवत बाटे” कहकर बनारस वाली पैसेंजर पकड़ लेता है।

यह वह भूभाग है जहाँ आदमी पैदा होने के पहले जाति में दर्ज हो जाता है और मरने के बाद वोट में। यहाँ राजनीति कोई विचारधारा नहीं, खानदानी धंधा है—जैसे पुराने जमाने में लोग सरसों पेरते थे, अब लोग वोट पेरते हैं।
पिछले चार दशक में यहाँ जितने नेता पैदा हुए हैं, उतने तो शायद मानसून में मेढ़क भी नहीं टर्राते होंगे। कोई नेता समाजवाद के नाम पर आया, कोई पिछड़ों की अस्मिता के नाम पर, कोई हिंदुत्व की लाठी लेकर और कोई दलित विमर्श का बस्ता उठाकर। लेकिन अंत में सबके घर की छत पर एक ही चीज सूखती मिली—सरकारी ठेका।

यहाँ राजनीति का चरित्र बड़ा गंवई है। नेता सुबह क्रांति करता है, दोपहर में गठबंधन और शाम तक मंत्रीपद की शपथ। जनता हर बार सोचती है कि इस बार कुछ बदल जाएगा। लेकिन बदलता सिर्फ पोस्टर का रंग है। पिछली दीवार पर हाथी था, अब साइकिल चढ़ गई है; कल कमल खिल जाएगा। दीवार बेचारा सोचता है—“हमार का कसूर बा?”

गोरखपुर का राजनीतिक तापमान तो ऐसा रहा कि वहाँ नेता नहीं, सीधे-सीधे “संस्थान” पैदा हुए। मठ, मठाधीशी और एक अजीब-सी परदेदारी।धर्म, विकास, जाति और अपराध ऐसे घुल-मिल गए जैसे गाँव के हलवाई की कड़ाही में बासी तेल। जनता को हर बार बताया गया कि अबकी पूर्वांचल बदल जाएगा। बदल भी गया—पहले बेरोजगार आदमी खेत में बैठता था, अब मोबाइल पर रील बनाता है।

देवरिया और कुशीनगर की हालत देखकर लगता है कि बुद्ध भगवान ने निर्वाण यहीं इसलिए चुना था कि आगे की व्यवस्था देखने की नौबत न आए। खेत सिकुड़ते गए, नौजवान खाड़ी देशों में उड़ते गए और गाँव में बूढ़े, बच्चे और चुनावी भाषण बचते गए। गाँव का सबसे पढ़ा-लिखा लड़का या तो दिल्ली में एसएससी की तैयारी कर रहा है या दुबई में टाइल लगा रहा है। और नेता? नेता अभी भी “पूर्वांचल एक्सप्रेसवे” के सपने में चाय डुबो रहा है।

बलिया का अलग दुख है। वह आज भी अपने को बागी मानता है। हर चौराहे पर चंद्रशेखर और जयप्रकाश की आत्माएँ भटकती प्रतीत होती हैं। लेकिन उन्हीं चौराहों के नीचे पान की पीक और प्लास्टिक की चाय की गिलासें राष्ट्रनिर्माण कर रही हैं। बलिया का आदमी क्रांति ऐसे करता है जैसे भांग पीकर कुएँ में कूदे—जोश भरपूर, दिशा संदिग्ध।

गाजीपुर में राजनीति और अपराध का विवाह इतना पुराना है कि अब लोग उन्हें अलग-अलग पहचानते ही नहीं। वहाँ नेता अगर जेल से चुनाव लड़ रहा हो तो जनता को उसमें संघर्ष दिखाई देता है। ईमानदार आदमी वहाँ उसी तरह संदिग्ध माना जाता है जैसे दारू की दुकान में तुलसीदास।

और मऊ! मऊ तो पूर्वांचल का वह अध्याय है जहाँ करघे की आवाज और कट्टे की आवाज बराबरी से सुनाई देती रही। कभी साड़ी की बुनाई से दुनिया पहचानती थी, अब दंगों और बाहुबल से पहचानती है। विकास वहाँ भी आया, लेकिन रास्ता पूछते-पूछते लौट गया।

पूर्वांचल का साहित्य भी बड़ा विचित्र है। यहाँ कविता लिखने वाला कवि आधा समय गोष्ठियों में बिताता है और बाकी आधा समय किसी पुरस्कार समिति के चक्कर में। गाँव का असली दुख अब साहित्य में कम और फेसबुक पोस्ट में ज्यादा मिलता है। साहित्यकारों की हालत ऐसी कि वे जनता से उतना ही डरते हैं जितना सरकारी बाबू आरटीआई से।

एक जमाना था जब भोजपुरी लोकगीतों में “नदिया, कजरी, बिरहा और विरह” बहता था। अब “लहँगा उठा देब” और “पियवा के कोरा’ ‘ढोंढ़ी चटना’ इस संस्कृति के राष्ट्रीय प्रतीक बन गए हैं। भोजपुरी संगीत का जो हाल हुआ है, उसे देखकर भिखारी ठाकुर भी स्वर्ग में कान बंद करके बैठे होंगे। गायक अब गला कम और कमर ज्यादा हिलाता है। गीत में शब्द कम, सिसकारी ज्यादा होती है।

पूर्वांचल का कलाकार भी बड़ा बेचारा जीव है। वह कला कम, जाति ज्यादा साधता है। कवि सम्मेलन में कविता सुनाने से पहले यह देखा जाता है कि मंच पर कौन जाति का कवि बैठा है। कलाकार की वैचारिकी उसके बैंक खाते से संचालित होती है। सरकारी अनुदान मिल जाए तो संस्कृति बची हुई है, नहीं तो “भारतीय सभ्यता खतरे में है” का बयान तैयार है।

यहाँ की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि पूर्वांचल अपने दुखों को भी मेले की तरह जीता है। बाढ़ आएगी, लोग नाव पर सेल्फी लेंगे। अस्पताल में ऑक्सीजन खत्म होगी, नेता श्रद्धांजलि ट्वीट करेगा। सड़क टूटेगी, जनता कहेगी—“चलऽ, ई त हर साल के बा।”
गोरखपुर का बीआरडी मेडिकल कॉलेज हो या देवरिया का जिला अस्पताल—बीमारी से ज्यादा आदमी व्यवस्था से मरता है। लेकिन जनता इतनी अभ्यस्त हो चुकी है कि उसे भ्रष्टाचार अब मौसम की तरह लगता है। “का करब, ई त चली”—यह पूर्वांचल का सबसे बड़ा राजनीतिक सिद्धांत है।

और जाति! अरे भाई, जाति तो यहाँ की ऑक्सीजन है। आदमी भूखा रह सकता है, लेकिन जातीय गौरव के बिना नहीं। चुनाव आते ही हर जाति अपने-अपने पुरखे चमकाने लगती है। कोई परशुराम निकालता है, कोई महाराजा सुहेलदेव, कोई निषादराज। ऐसा लगता है मानो इतिहास नहीं, बारात निकल रही हो।

पूर्वांचल का नौजवान बड़ा प्रतिभाशाली है। वह रेलवे भर्ती से लेकर यूट्यूब चैनल तक सबमें हाथ आजमा चुका है। लेकिन व्यवस्था ने उसे इतना ठगा कि अब वह या तो मोटिवेशनल वीडियो देखता है या किसी बाबा का प्रवचन। उसके सपनों की हालत सरकारी स्कूल की खिड़की जैसी है—टूटी हुई लेकिन अभी भी खुली।

यह इलाका भारत का सबसे जीवंत, सबसे संवेदनशील और सबसे त्रासद भूगोल है। यहाँ आदमी गाली भी कविता की तरह देता है और दुख भी हँसते हुए सुनाता है। यही पूर्वांचल की ताकत है और यही उसकी विडंबना।
यहाँ लोकतंत्र आज भी चौपाल पर बीड़ी पीता है, संस्कृति जर्जर हारमोनियम पर कजरी गाती है और विकास किसी सरकारी फाइल में पान की पीक से चिपका पड़ा है।
फिर भी पूर्वांचल जिंदा है।
क्योंकि यहाँ आदमी टूटता जरूर है, लेकिन हँसना नहीं छोड़ता।
उसे मालूम है कि जिंदगी चाहे जितनी “फट्टू” निकले, शाम को चाय की दुकान पर राजनीति फिर भी होगी, और कोई न कोई कहेगा—
“देश बदल रहल बा।”
बाकी लोग मुस्कराकर खैनी दबा लेंगे।

पूर्वांचल में राजनीति अब सेवा नहीं, ‘सेल्फी विद समाज’ कार्यक्रम हो गई है। नेता जी सड़क का उद्घाटन ऐसे करते हैं जैसे खुद गंगा मैया को धरती पर उतार लाए हों। पांच फीट की नाली पर दस फीट का पोस्टर, और पोस्टर में नेता जी का चेहरा ऐसा चमकता है मानो सूर्यदेव भी उनसे एलईडी बल्ब उधार लेते हों।

अभी २०२७ में फिर लोकतंत्र का एक खेला/मेला/तमाशा होने वाला है। जातियों की तलवारें म्यानों से निकलनी शुरू हो गयी हैं। अभिशाप अभी लम्बा चलता दिखता है क्योंकि बिना किसी का नाम लिए कहूं कि पूर्वांचल के लिए किसी भी नेता के पास ‘लॉंग टर्म सस्टेनेबल विज़न’ का नितांत अभाव है।

गंगा, सरयू, नारायणी, राप्ती, आमी की उर्वरता को कर्मनाशा की हवाएं खा गयी हैं। पुनर्जागरण, क्रान्ति, स्वधर्म यह सब मुर्दा मुहावरे मात्र हैं।

मधुसूदन उपाध्याय
तारामण्डल
ज्येष्ठ अधिक मास शुक्ल त्रयोदशी
वि. सं. २०८३

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