परख सक्सेना : नरोत्तम मिश्रा से मोहन यादव तक ;बदलती भूमिकाओं का संदेश

नरोत्तम मिश्रा को लेकर जो प्रकरण चल रहा है वह दर्शाता है कि हमारी मानसिकता आज भी गुलामी की ही है। लोकतंत्र हमें राजनीतिक रूप से मिला है मगर ढांचा हमारा राजतांत्रिक ही है।

नरोत्तम मिश्रा एक कमाल के नेता है इसमें कोई शक नहीं, गृहमंत्री के रूप मे भी उनका कार्यकाल मोटे तौर पर अच्छा ही रहा। शिवराज जैसे सॉफ्ट नेता की कैबिनेट मे एक हार्ड हिंदुत्व का फेस थे, लेकिन समस्या आती है ज़ब आप बतौर समर्थक कांग्रेस की तरह सोचना शुरू कर देते है।

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ये कांग्रेस की परंपरा है कि एक नेता की गुलामी एक पीढ़ी करती है फिर उसके बेटे की गुलामी और फिर उसके पौते की। लोकतंत्र की तो नींव ही इसी पर है कि गुलामी खत्म हो, नरोत्तम मिश्रा 1990 मे चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। 1990 का अर्थ है कि मध्यप्रदेश की आधी आबादी तब पैदा भी नहीं हुई थी क्योंकि हमारी औसत आयु ही 30 से कम है।

2005 मे तो वे गृहमंत्री बन चुके थे, तब से आज तक मे दूसरी पीढ़ी भी पैदा हो गयी। तकनीक बदल रही है, जमाना बदल रहा है, लोगो की डिमांड बदल चुकी है और ऐसे समय मे आप बस अपनी फैन फॉलोइंग कायम रखने के लिए चाहते है कि बार बार नरोत्तम मिश्रा ही खडे हो।

कांग्रेस के पतन का उपहास करने की जगह उससे सीख लीजिए, कांग्रेस गिर गयी क्योंकि उसे एक परिवार को ही सर्वोच्च रखना था। कांग्रेस मे कभी चाय बेचने वाला या कोई कवि प्रधानमंत्री नहीं बन सकता, आप एक परिवार मे नहीं जन्मे तो बस आपकी योग्यता समाप्त इतना ही कांग्रेस का क्राइटेरिया है।

इसीलिए आज ऐसे दौर मे है कि 414 से घटकर 100 के भी नीचे पहुँच गए है, कांग्रेस का दिवालियापन आप इससे भी देख लीजिये कि वे 99 सीटों को भी उपलब्धि मानकर जश्न मना रहे थे। क्या यही दशा आप बीजेपी की भी चाहते है?

बीजेपी के मुख्यमंत्री से आप कितना भी नाखुश हो लेकिन एक मैसेंजिंग क्लियर है कि यहाँ कुछ भी हो सकता है। जो आज विधायक है वो कल को दरी भी बिछा सकता है और आज जो दरी बिछा रहा है वो मंत्री बन सकता है। आप भले ही मोदीजी से भी क्यों ना दुखी हो लेकिन मोदीजी से बेहतर विकल्प आपको बीजेपी मे ही मिलेगा।

इसलिए संगठन को मजबूत रखिये, नेता आएंगे और जाएंगे टिकेगा वही जो समय के साथ चलेगा। 1952 मे 50 से ज्यादा नई पार्टियां बनी थी लेकिन अब तक सिर्फ बीजेपी ही चल रही है क्योंकि बाकी सब पुराने ढर्रो पर चल रही थी। कांग्रेस का हाल भी आपके सामने है, इसलिए किसी नेता की गुलामी या चमचागिरी करने से बेहतर है विरोध करना सीखिए।

नरोत्तम मिश्रा अपनी ही गति को प्राप्त हुए है, उन्होंने प्रायश्चित भी किया है मगर ये कोई गलती नहीं अपितु प्रारब्ध का एक मोड़ था। एक समय था ज़ब वे उज्जैन के प्रभारी होने के नाते मोहन यादव का हिसाब लगा रहे थे और आज ये समय है कि वही मोहन यादव उन्हें तसल्ली दे रहे है।

यही शुद्ध राजनीति है भूमिका बदलती रहनी चाहिए, ये नियम खुद मोदी शाह पर भी लागू होता है। अटल आडवाणी एक अछूत पार्टी को सत्ता के केंद्र मे लाये थे, मोदी शाह उसे एक नई ऊचाई पर ले गए जिसमे सब समाना चाहते है। अगली जोड़ी जो भी आएगी वो इनसे भी ऊपर ले जायेगी, सकारात्मक और निरंतर परिवर्तन यही तो होते है।

इसलिए नेताओं को नहीं संगठन को देखिए, मै खुद निजी रूप से अपने भाजपाई विधायक, सांसद और मुख्यमंत्री से खुश नहीं हूँ मगर ये विश्वास है कि अगली बार मे यदि इन्हे हटाया गया तो ये बीजेपी मे ही हो पायेगा। संघ पर विश्वास रखिये और परिवर्तन को स्वीकारना सीखिए, जो कल थे वे आज नहीं है और जो आज है वे कल नहीं होंगे। लेकिन बीजेपी 1952 मे भी थी, 1996 मे भी थी, 2014 मे भी थी और 2044 मे भी होंगी।

✍️परख सक्सेना✍️
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