डॉ. जयप्रकाश सिंह : इतिहास के खुरदुरे यथार्थ को परदे पर मनोरंजक ढंग से उतारने की पृष्ठभूमि है सम्राट पृथ्वीराज

फिल्म सम्राट पृथ्वीराज के अंत में डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी कुछ पंक्तियों में फिल्म का सारांश पढ़ते हैं. इस बहाने वह भारत के पूरे सभ्यतागत-संघर्ष का सारांश भी पढ़ जाते हैं. दबावों और फार्मूलों को सहते हुए, उनको थोड़ा-बहुत स्थान देते हुए भी अपने अनुरुप निर्णायक संदेश कैसे गढ़ा और पढ़ा जाए, फिल्म के अंत की वह चार-पंक्तियां हमें बता देती है. विशेषकर जब वह कहते हैं कि भारत 755 वर्षों के संघर्ष के बाद 1947 में स्वतंत्र होता है, तो उसमें गंभीर सभ्यतागत संदेश छिपा है.

जब आपके पास अपनी बात कहने के संसाधान और प्लेटफार्म न हों तो सबसे अच्छी स्थिति तो यही होती है कि आप किसी भी सिस्टम के दबावों को सहन करते हुए उसकी क्षमताओं का उपयोग अपनी बात कहने के लिए कर लें. सम्राट पृथ्वीराज को देखने पर यही लगता है कि फिल्म में इसी नीति का पालन किया गया है. जो ’सम्राट पृथ्वीराज’ में ’चाणक्य’ की झलक देखना चाहते हैं, वह थोड़े निराश हो सकते हैं. चाणक्य एक निर्माता-निर्देशक का स्वप्न था और सम्राट पृथ्वीराज महज निर्देशक का प्रयास है. फिल्म देखने के बाद निर्देशक पर निर्माताओं के दबाव को स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है.

बॉलीवुड में स्थापित मानसिकता और फार्मूलों के दबाव के कारण ही इण्टरवल के पहले फिल्म की गति बहुत कमजोर दिखती है और कहानी भी भटकती हुई नजर आती है. लेकिन फिल्म के दूसरे हिस्से पर डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी की छाप अधिक स्पष्ट है. इण्टरवल के बाद दर्शक फिल्म में बंध जाता है और सोचने-विचारने पर विमर्श हो जाता है.

अक्षय कुमार की भूमिका को लेकर सोशल मीडिया में बहुत प्रश्न उठाए गए, लेकिन पृथ्वीराज की भूमिका में वह बहुत अजीब नहीं लगते. संजय दत्त और मानुषी छिल्लर का अभिनय बेजोड़ कहा जा सकता है. अक्षय-कुमार के आस-पास जिन अभिनेताओं ने भूमिका निभाई है, वह फिल्म को कमजोर नहीं पड़ने देती. गोरी और चामुण्ड के लिए निभाई भूमिकाएं भी अपनी छाप छोड़ती हैं.

ऐतिहासिक महत्व की दृष्टि से देखें तो तत्कालीन युद्धों और रणनीतियों को बहुत सफलता के साथ फिल्म में दर्शाया गया है. युद्ध और युद्ध के मैदान यथार्थ के बहुत नजदीक लगते हैं. कुछ दृश्य ऐसे हैं, जो उस समय के युद्धों की प्रतिनिधि छवि बनकर हमारे मस्तिष्क में बस जाते हैं. प्रथम युद्ध में गोरी को हाथी से नीचे गिराने की रणनीति और वीरता सृजनात्मकता को एक नए स्तर तक लेकर जाती है.

यह फिल्म एक जरुरी बहस का उत्तर भी देती है कि भारतीयों को निरंतर संघर्षरत क्यों रहना पड़ा और अनेकों बार पराजय का सामना करना क्यों पड़ा? प्रायः इसका उत्तर वीरता और संख्या के संदर्भों में खोजा जाता है. फिल्म यह दिखाती है कि पराजयों का मुख्य कारण मुख्यतः ऐसे अनैतिक तरीकों का उपयोग करना है, जिनकी कल्पना भी भारतीयों के परे थी. भारतीय संदर्भों में युद्धों की भी एक मर्यादा थी, जबकि आक्रांताओं की युद्धनीति का मुख्य आधार ही धोखा और अनैतिकता थी. जब तक भारतीय शासक इस तरह की नई मानसिकता को समझते और उसके लिए स्वयं को तैयार करते तब तक विदेशी आक्रांता निर्णायक बढ़त हासिल कर चुके थे.

’योद्धा बण गई मैं’ के अतिरिक्त फिल्म का गीत-संगीत कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाता. पृथ्वीराज के समय लश्करी जबान का प्रभाव बहुत अधिक नहीं था, लेकिन गीत और संवाद में लश्करी जबान का प्रयोग फिल्म के प्रवाह को बाधित कर देता है. डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म में शब्दों को लेकर संवेदनशीलता न बरती गई हो, यह बात दर्शक पचा नहीं पाता.

यह फिल्म और इस पर आ रही प्रतिक्रियाएं डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी को इस बात के लिए आगाह भी करती हैं कि उनकी ताकत उनका इतिहास बोध और पटकथा है. इससे हटकर अन्य आयामों पर फोकस करने पर उनकी फिल्में आकर्षण खो देती हैं. पिंजर, मोहल्ला अस्सी और जेड प्लस का आकर्षण पटकथा और इतिहास-बोध ही था और कमी बॉलीवुड फार्मूलों को जबरदस्ती फिल्म में घुसेड़ने की थी. सम्राट पृथ्वीराज में भी बॉलीवुड के फार्मूले कई जगह हावी हो गए हैं और जहां भी उन फार्मूलों को जगह दी गई है, वहां फिल्म कमजोर हो गई है.

जिन दर्शकों को फिल्म से आपत्ति है, उन्हें यह समझना चाहिए कि कोई भी फिल्म ऐतिहासिक सच्चाई को ज्यों का त्यों नहीं कहती. फिल्म में कहानियों को कहने का अपना तरीका होता है. बॉलीवुड में पहले इस तरह की फिल्मों का चयन दुष्कर कार्य है और बड़े बैनर द्वारा ऐसी किसी फिल्म को निर्मित करने के लिए तैयार होना और भी मुश्किल कार्य है. ऐसे दबावों के बीच यदि फिल्म बनी है तो यह एक अवरोध को तोड़ने जैसा है. ऐसी फिल्मों से इतिहास पर बहस प्रारंभ होती है और फिर सच्चा और पूरा इतिहास भी लोगों के सामने आता है. इतिहास का जो सच इस फिल्म में नहीं आया है, वह किसी और फिल्म के जरिए आए, उसके लिए प्रयास होने चाहिए.

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि विभिन्न दबावों को सहते हुए और विभिन्न पक्षों को साधते हुए अपनी बात फिल्मों में कैसे कही जाए, इतिहास के खुरदुरे यथार्थ को फिल्मी परदे पर मनोरंजक ढंग से कैसे उतारा जाए, उसकी आवश्यक पृष्ठभूमि फिल्म सम्राट पृथ्वीराज ने बांधी है. इसीलिए, इसे अवश्य देखा जाना चाहिए.

(लेखक हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय में असिस्टिेंट प्रोफेसर एवं संचार-रणनीति के विशेषज्ञ हैं.)

साभार : नीलेश कुमार शुक्ला

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *