राजीव मिश्रा : ये खेलों के मेडल नहीं.. राष्ट्र के पुनर्जागरण के चिन्ह

कहते हैं, गॉल्फ एक ऐसा खेल है जो आप अपने विरुद्ध खेलते हैं.
सच कहें तो जिन्दगी ही ऐसा एक खेल है.
स्पोर्ट्स में इंग्लैंड में कितनी सुविधाएं हैं, ऑस्ट्रेलिया के पास कैसा स्पोर्ट्स कल्चर है, अमेरिका के पास कितना बड़ा टैलेंट पूल है और चीन के पास कैसा सिस्टम है यह तुलना करने का विषय नहीं है. तुलना करनी है तो यह कीजिए कि हम पहले कहां थे और आज कहां तक पहुंचे.
कॉमनवेल्थ खेलों में जितने मेडल आए और वहां कॉम्पिटिशन का लेवल क्या है, उनका महत्व कितना है यह बात सर खपाने की नहीं है. क्राइटेरिया सिम्पल रखिए… हम पहले कहां थे और आज कहां पहुंचे? हमें चालीस साल पहले किन खेलों में कितने मेडल आते थे, दस साल पहले कितने आते थे और आज कितने आ रहे हैं?
चालीस साल पहले हमें ओलंपिक्स में कभी कुछ भी नहीं आता था और कॉमनवेल्थ में कुश्ती में दो एक और कभी कभार बैडमिंटन का एकाध मेडल आता था. आज हम स्विमिंग, डाइविंग, साइक्लिंग और जिम्नास्टिक्स छोड़ कर लगभग हर खेल में दिखाई दे रहे हैं. ट्रैक एंड फील्ड तक में छह सात मेडल आ गए. हॉकी में हम वापस अपनी जमीन हासिल कर रहे हैं. क्रिकेट हमारे देश का इकलौता ऑब्सेशन नहीं रहा. यह सफलता जो कॉन्फिडेंस देगी उसका असर ओलंपिक्स में भी दिखाई देगा और देश के पूरे माइंडसेट पर हर क्षेत्र में दिखाई देगा.
    एक समय भारतीय खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सिर्फ भाग लेने जाते थे. खिलाड़ियों से ज्यादा वीआईपी उनके साथ मैनेजर कोच बनकर मुफ्त की सैर करने वाले नौकरशाह हुआ करते थे. हमने वह समय भी देखा है कि 1982 में मेडल जीतने वाले बॉक्सर को उसका कोच धक्के देकर राजीव गांधी के पैर छूने को कह रहा था. जब एशियाई खेलों का गोल्ड जीतकर लौटी इंडियन टीम के टॉप छह खिलाड़ियों को सिर्फ इसलिए टीम से बाहर कर दिया गया था कि वे अपने को स्टार न समझने लगें. आज खिलाड़ी सर उठा कर स्टार पॉवर एंजॉय कर रहे हैं और देश का सर भी ऊंचा कर रहे हैं. उसमें बेकार की मीन-मेख न निकालें.
अगर आप 80s के दशक में बड़े हुए हों तो आप समझ पाएंगे…अगर तब आपको कोई कहता कि एक दिन भारत को ओलंपिक में एथलेटिक्स में एक स्वर्ण आएगा तो आप उसे दिमाग के डॉक्टर के पास जाने की सलाह देते. पूरी पूरी पीढ़ी मिल्खा सिंह और पी टी उषा के चौथे स्थान और श्रीराम सिंह के सातवें स्थान को याद करके चली गई. मुझे याद है कि 1982 के एशियाई खेलों में 20 किलोमीटर पैदल चाल का गोल्ड जीतने वाले चांद राम उसी के ठीक बाद कॉमनवेल्थ खेलों में बीसवें या तीसवें स्थान पर आए थे.
आज कॉमनवेल्थ में एथलेटिक्स में सिल्वर आते हैं तो मन नहीं मानता…ओह! गोल्ड क्यों नहीं!!!
क्या बदला है? सिर्फ सरकारी सुविधा और खेलों से मिलने वाला पैसा?
जी नहीं! खेल राष्ट्र की आत्मा का दर्पण हैं. यह सिर्फ खेलों के मेडल नहीं हैं, राष्ट्र के पुनर्जागरण के चिन्ह हैं.
सच तो यह है कि हम इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया से नहीं, अपने ही समाजवादी नौकरशाही अतीत से कंपीट कर रहे हैं. जबतक हम यह कॉम्पिटिशन जीत रहे हैं, मैं खुश हूं. पिछली कई सदियों में यह एक भारतीय होने का सबसे अच्छा समय है.

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