प्रधानमंत्री ने जनरल हरिंदर सिंह की ब्रीफिंग सुनने के बाद कहा, “मुझे इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है कि चीनियों ने क्या किया है और वे क्या करेंगे।  मुझे इस बात में दिलचस्पी है कि आपने क्या किया है और आप क्या करेंगे।”

इस एक प्रश्न ने भारत की सेना को रक्षात्मक पोजीशन से हटकर आक्रामक पोजीशन लेने के लिए प्रेरित किया।

 

पंचायत का द्वितीय सीजन देख लिया। अंतिम एपिसोड का यह कथन कि गाँव-देहात के किशोर-युवा लड़के सैनिक-अर्ध सैनिक बल ज्वाइन करते है और 20 – 30000 रुपये माह के लिए जान दे देते है, में सत्यता है। 

भारत में इस समय के सैनिक-अर्ध सैनिक बल बहुतायत में इन्ही गाँवो से आते है।  इन्ही के दम पर, साहस और मर-मिटने की भावना पर राष्ट्र सुरक्षित है। चाहे वह जवान हो या सेकंड लेफ्टिनेंट, लेफ्टिनेंट, मेजर।

आर्मी की ट्रेनिंग एवं रहन-सहन इन्हे इतना सोफिस्टिकेटेड – सुसंस्कृत-  कर देती है कि इनकी कड़क यूनिफार्म, बाल एवं शेव, चाल-ढाल से इनके बैकग्राउंड एवं शिक्षा के बारे में पता ही नहीं चलता।

जब कभी भी सैनिको द्वारा प्राण न्योछावर होने का समाचार आता है, तब डिटेल पढ़िए तो यह सभी ग्रामीण, निर्धन या निम्न माध्यम वर्ग एवं परिवेश के मिलेंगे।

कारण यह है कि शहरी एवं उच्च मध्यम वर्ग के बच्चे अब कम्फर्ट की नौकरी ढूढ़ते है। ऐसा नहीं है कि इस वर्ग के युवा में देश प्रेम की भावना नहीं है, लेकिन कहीं ना कहीं कमाई एवं सुख-सुविधा वाला जीवन प्राथमिकता बन जाता है।

यही स्थिति सनातन धर्म, जीवन पद्धति की भी है जो इन्ही गाँव-देहात में फल-फूल रही है, प्रसारित एवं संरक्षित हो रही है। प्रत्येक गाँव में स्थानीय कुल देवी-देवता का निवास होता है।  आज भी गाँव में प्रतिदिन मंदिर जाते है, अक्षय तीज के समय निर्जल व्रत, अखंड पाठ, शिवरात्रि धूम-धाम से मनाया जाता है।

सनातन धर्म के द्वारा ही प्रकृति एवं पर्यावरण का संरक्षण होता है, ना कि किसी वातानुकूलित कक्ष में पर्यावरण पर लेक्चर देने से। खेत, खलिहान, पशु पालन, बाग़ इत्यादि हमारे देवी-देवता, पूजा एवं श्रद्धा का अभिन्न अंग है।

लेकिन यह भी कटु सत्य है कि मोदी सरकार के आने के पूर्व सारी बेसिक सुविधाएं – जैसे कि नल से जल, बिजली, घर, शौचालय, बैंक अकाउंट, स्वास्थ्य सेवा एवं इंश्योरेंस, लोन, कुकिंग गैस, इंटरनेट, नाली, मल-मूत्र निकासी इत्यादि – शहरी क्षेत्र में उपलब्ध थी।

और जब गाँवों में यह सब सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती है तो हम लोग मुफ्तखोरी कहकर उन्ही ग्रामीणों का मजाक उड़ाते है, उनका अपमान करते है। जबकि स्वयं की मुफ्तखोरी – महिलाओ के लिए दिल्ली में फ्री बस, फ्री बिजली, लगभग फ्री सरकारी शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधा, नल से जल, मल-मूत्र निकासी, नगण्य संपत्ति कर, इत्यादि – को भूल जाते है।

फिर हम उन लोगो का भी मजाक उड़ाते है कि एक चावल की बोरी (राइस बैग) के लिए अपना धर्म बदल लिया।

आखिरकार अधिकतर कन्वर्ज़न वाले वीडियो में किसी असाध्य बीमारी (लकवा, कैंसर, खराब आँख, लंगड़ापन इत्यादि) को एकाएक ठीक होते हुआ क्यों दिखाया जाता है। उत्तर यह है कि किसी असाध्य बीमारी से जूझता व्यक्ति और उसका परिवार मानसिक एवं आर्थिक रूप से टूट चुका होता है और ऐसे झांसे में तुरंत आ जाता है।

जय हो वाले गायक के परिवार ने ऐसे ही किसी बीमारी के समय अपनी सोच बदल ली थी। यही धंधा कोलकत्ता की मदर और उनके अनुनायी करते है।

हमारे पास इस राइस बैग को रोकने का कोई सॉलिड प्रोग्राम नहीं है। लेकिन अगर सरकार फ्री राशन, इनकम सपोर्ट, आयुष्मान स्वास्थ्य इंश्योरेंस के द्वारा निर्धनों को सशक्त करती है, उन्हें राइस बैग के झांसे से दूर करती है, तो हम चिल्लाना शुरू कर देते है।

अगर मोदी सरकार स्मार्ट नीति के द्वारा ग्रामीण भारत, और उसके द्वारा सनातन जीवन पद्धति, को सशक्त करती है, तो वह आपको मुफ्तखोरी लगता है। जब कोई सोच या धर्म बदलता है, तब आप शोर मचाने लगते है।

 कई योजनाएं एससी, एसटी, ओबीसी और गरीब वर्ग के सवर्ण हिंदुओं के लिए भी सोशल जस्टिस विभाग द्वारा चलाई जा रही है। जैसे छात्रवृत्ति, फ्री कोचिंग सुविधा इत्यादि! हिंदुओ का विकास और हिंदुओ का विश्वास यदि मायने नहीं रखता तो राम मंदिर नहीं बनता, 370 नहीं हटता, नागरिकता कानून में संशोधन नहीं होता, काशी विश्वनाथ कॉरीडोर, विंध्याचल कॉरीडोर, अयोध्या का भव्य विकास, रामायण सर्किट, कृष्ण सर्किट, चार धाम हाईवे प्रोजेक्ट, केदारनाथ धाम का पुनरुद्धार, नमामी गंगे जैसी अनेक हिंदू आस्था, विकास और विश्वास से जुड़ी योजनाएं चल रही है।

कैलाश मानसरोवर तक पक्की सड़क का निर्माण, कैलाश मानसरोवर भवन का निर्माण, कामधेनु आयोग का गठन इत्यादि!
जब पानी, गैस, घर, जल, बैंक अकाउंट इत्यादि मिलता है तो सभी को मिलता है। जब कशी विश्वनाथ का सौंदर्यीकरण होता है तो वह किनके लिए होता है? जब गौ वंश की संरक्षा होती है तो वह किसके लिए होती है? जब पाठ्यक्रम में गीता पढ़ाई जायेगी तो वह किसके लिए है? आर्थिक आधार पर 10% आरक्षण किसके लिए है?

 

आप की शिकायते बहुत है। लेकिन सोल्यूशन जीरो है।

स्पष्ट है कि आपने लेख ध्यान से नहीं पढ़ा है। मैंने वही लिखा है जो आप पूछ रहे है। OROP में झोल केवल आप पार्टी के चंडीगढ़ में बैठ रिटायर्ड जनरल बतला रहे थे।  वे भी अब चुप है।

जब मैंने पूछा कि ऐसा कौन सा कदम है जो मोदी सरकार को सैन्य कर्मियों के लिए लेना चाहिए और नहीं लिया गया है, तो आप कुछ और ही लिख रहे है।

मैं बतलाता हूँ कि मोदी सरकार ने क्या कदम उठाये है। OROP मजबूत सुरक्षा के लिए आधुनिक उपकरण एवं हथियार, गाड़ियां, सीसीटीवी कैमरा, अत्याधुनिक बंदूकें, राडार, कमांडो ट्रेनिंग इत्यादि। लेकिन सबसे बड़ा योगदान था उत्साहवर्धन – किसी भी हमले का प्रतिउत्तर अपने तरीके से देने की छूट।

एक उदहारण दूंगा। प्रधानमंत्री मोदी की 3 जुलाई 2020  लद्दाख यात्रा के दौरान सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने सीमा पर स्थिति के बारे में ब्रीफ किया गया।

लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह ने उन्हें जानकारी दी कि चीनी सेना ने क्या कार्रवाई की है और आगे क्या करने की संभावना है।

प्रधानमंत्री ने जनरल हरिंदर सिंह की ब्रीफिंग सुनने के बाद कहा, “मुझे इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है कि चीनियों ने क्या किया है और वे क्या करेंगे।  मुझे इस बात में दिलचस्पी है कि आपने क्या किया है और आप क्या करेंगे।”

इस एक प्रश्न ने भारत की सेना को रक्षात्मक पोजीशन से हटकर आक्रामक पोजीशन लेने के लिए प्रेरित किया।

पहली बार भारत बचाव करने और बात-चीत के निवेदन की जगह आक्रामक स्थिति में है।

सीमा पार आतंकियों के विरुद्ध पहले ही यह पोजीशन ले ली गयी थी।

देश का कल्याण तो तभी हो गया था..! जब इंदिरा गाँधी ने निजी बैंको का राष्ट्रीयकरण कर दिया था; उसके बाद भी 43 करोड़ लोगो के पास कोई बैंक अकाउंट नहीं था। मैंने स्वयं बैंक ड्राफ्ट बनवाने के लिए पूरा दिन सरकारी बैंको के धक्के खाए है, तब जाकर ड्राफ्ट मिलता था। हिंदुस्तान जिंक पहले से ही निजी क्षेत्र के पास है। यह सरकार केवल अपना बचा-खुचा शेयर बेच रही है जो एक सामान्य व्यवसायिक गतिविधि है।

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