कौशल सिखौला : मौन, उपेक्षा और मर्यादा मोदी की राजनीति की असली भाषा
धुरंधर फिल्म के एक किरदार का डायलॉग मारें तो जवाब तो मोदी भी बड़ा कसाई देते हैं । एक खूबी है कि बस खून नहीं निकलने देते । मई की एक आधी रात में कुल 25 मिनट का बेहद कसाई हमला कर पाकिस्तान का भूत बना दिया । उसके बाद 45 बार शेखचिल्ली की तरह चिल्ला चिल्लाकर युद्ध रुकवाने का दावा करने वाले दुनिया के सबसे ताकतवर इंसान डोनाल्ड ट्रम्प को बगैर एक भी शब्द बोले ऐसी पटखनी दी कि विश्व में उनकी छवि जोकर के सिंहासन पर जा बैठी ।
ट्रम्प के मनमाने टैरिफ को धूल चटाते हुए कुछ ही महीनों में दुनियाभर में बाजार फैला दिया । जीएसटी मॉड्यूल बदलकर घरेलू बाजार को ऐसा उछाला दिया कि अर्थव्यवस्था आसमान पर उड़ चली , दुनिया में भारत चौथे स्थान पर पहुंच गया । आज ईरान जैसे देश भी ट्रंप के हव्वे से बाहर निकल गए हैं और ट्रंप की चाहत के विपरीत भारत ने रूस से तेल की खरीद और ज्यादा बढ़ा दी है । भारत ने चीन और रूस से ही एक साथ हाथ नहीं मिलाया , अफ्रीका , अरब और यूरोप में भी नए बाजार खोज निकाले हैं ।
हमारे देश को एक बीमारी लग गई है । लगातार करारे तमाचों से कुछ लोगों की दिमागी सोच शक्ति बेहद क्षीण पड़ गई है । कहते हैं कि मोदी कभी भी ट्रंप को नाम लेकर जवाब क्यों नहीं देते ? ये वही छद्मवादी लोग है जो गलवान के समय कहते थे मोदी चीन का नाम नहीं लेते । उनका दोष नहीं । उन्होंने तो अपने अधकचरे नेता को तू तड़ाक करते हुए ही देखा सुना है । भाषा की बानगी लीजिए और उनका दिमागी स्तर देखिए । मोदी कहता है , भागवत बोलता है , मुख्यमंत्री कहता है आदि आदि ।
वे चाहते हैं कि प्रधानमंत्री भी इसी भांति जिनपिंग बोला , ट्रंप कहता है जैसी असंस्कारी फटीचर भाषा बोलें । दरअसल वे जानते ही नहीं कि मौन भी एक भाषा है जिसकी मार सही नहीं जाती । उपेक्षा भी एक भाषा है जिसकी मार सही ना जाए । मोदी ने बुलावे पर भी ट्रंप से मिलना छोड़ दिया । फोन पर पूरी बातें की पर एक बार भी 50% टैरिफ को घटाने पर बात नहीं की । साल बीत गया , ट्रंप की घुड़कियों की हवा निकल गई , भले ही सबसे ताकतवर हों किन्तु उनकी न रूस सुनता है न यूक्रेन । भारत मौज ले रहा है ।
नए साल के पहले दिन एक कामना तो जरूर करेंगे । विघटनकारी शक्तियों का खात्मा हो , देश दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करे । यहाँ के नागरिक खुशहाल हों , सेना अति बलशाली हो , भारत के वैज्ञानिक बेशुमार उपलब्धियां हासिल करे , देश का युवा आसमान छुए , हर घर समृद्धि आए । पर हे डोनाल्ड ट्रंप आप भी सुखी रहें , अमेरिका से भारत ने ” नेशन फर्स्ट ” की नीति सीखी है । ट्रंप को कुछ भी मिले एक बात तय है । उन्हें नोबल पुरस्कार कभी नहीं मिलेगा । जो आदमी भारत की तेजी से उभरती इकोनॉमी को डैड इकॉनमी कह सकता है , वह निश्चित रूप से हिल गया है । वे तो पहले ही हिल चुके हैं जो भारत बैठे बड़ी बेशर्मी से ट्रंप की हां में हां मिला रहे हैं ?


