कश्मीर फाइल्स / सेंसर बोर्ड : खूँखार आतंकी के घर भारत के एक पूर्व PM.. JNU को ANU किया..सहित कई कट्स

विवेक अग्निहोत्री ने सालों रिसर्च कर इस फिल्म की कहानी पर काम किया है जो स्क्रीन पर साफ नजर आता है। कश्मीरी पंडितों के विस्थापन और नरसंहार की इस कहानी में निर्देशक ने कई विषयों को छुआ है। ” कश्मीरी पंडित ” वामपंथियों का गढ़ा गया नैरेटिव है क्योंकि इनका उद्देश्य पंडित यानि ब्राम्हण घृणा की आड़ में भारतीय संस्कृति का पतन करना है, जबकि भगाए गए लोगों में सिक्ख, दलित, वैश्य, ब्राम्हण सभी जाति के लोग थे, इसलिए ही इन्हें “कश्मीरी हिंदू” न कहकर “कश्मीरी पंडित” का नाम दिया गया।

 

कश्‍मीरी पंडित संघर्ष समिति के अनुसार, जनवरी 1990 में घाटी के भीतर 75,343 परिवार थे। 1990 और 1992 के बीच 70,000 से ज्‍यादा परिवारों ने घाटी को छोड़ दिया। एक अनुमान है कि आतंकियों ने 1990 से 2011 के बीच 399 कश्‍मीरी पंडितों की हत्‍या की। पिछले 30 सालों के दौरान घाटी में बमुश्किल 800 हिंदू परिवार बचे हैं

निर्माता-निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने फिल्म को लेकर दायर की गई याचिका की जानकारी देते हुए एक पोस्ट को शेयर किया था। विवेक अग्निहोत्री ने कहा है कि ‘द कश्मीर फाइल्स’ 2018 में बननी शुरू हुई थी। इसमें 4 साल की कड़ी रिसर्च और मेहनत लगी है। उन्होंने कहा कि यह फिल्म आजाद भारत का वह कलंक है जिसको किसी ने आज तक फिल्मी पर्दे पर लाने का प्रयत्न अथवा साहस नहीं किया। उन्होंने दावा किया कि कश्मीर में 1990 में जो नरसंहार हुआ था, यह फिल्म उसका सत्य है।

फ़िल्म में निर्देशक ने खासतौर पर तीन किरदारों के जरिए कश्मीरी पंडितों की पीड़ा दिखाने की कोशिश की है।

कश्मीरी पंडितों की सच्ची त्रासदी पर आधारित ये फिल्म आपको हिला कर रख देगी। 1990 के का वो भयावह दौर जब कश्मीरी पंडितों को अपने ही घरों को छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया था। फिल्म यह भी बताती है कि वो सिर्फ एक पलायन नहीं बल्कि नरसंहार था।

फिल्म की कास्टिंग के मामले में डायरेक्टर का चयन उनकी कहानी के हिसाब से सटीक बैठता है। मानो एक-एक एक्टर उसी किरदार के लिए बना हो।

इस फिल्म में इस बात का जिक्र प्रमुखता से किया गया है कि कैसे राजनीतिक कारणों से कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को सालों साल दबा कर रखा गया।

1990 में कश्मीरी पंडितों संग हुई उस घटना को बयां करती है, जिसने उन्हें आतंकियों ने अपने ही घर से भागने पर मजबूर कर दिया था। फ़िल्म देश के टॉप कॉलेज की पॉलिसी, मीडिया और सरकार पर कटाक्ष करती है, इस फिल्म के जरिए विवेक 30 साल से दर्द लिए कश्मीरी पंडितों को न्याय दिलाने की बात करते हैं।

 

अगर आंकड़ों से कश्‍मीरी पंडितों का दर्द बयां हो पाता तो समझ‍िए। 20वीं सदी की शुरुआत में लगभग 10 लाख कश्‍मीरी पंडित थे। आज की तारीख में 9,000 से ज्‍यादा नहीं हैं। 1941 में कश्‍मीरी हिंदुओं का आबादी में हिस्‍सा 15% था। 1991 तक उनकी हिस्‍सेदारी सिर्फ 0.1% रह गई थी। जब किसी समुदाय की आबादी 10 लाख से घटकर 10 हजार से भी कम रह जाए तो उसके लिए एक ही शब्‍द है : नरसंहार।

फ़िल्म के डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री हैं, जो इससे पहले लालबहादुर शास्त्री की मौत से जुड़ी मिस्ट्री पर एक फ़िल्म द ताशकंद फाइल्स बना चुके हैं। इसके अलावा लेफ़्ट विंग को लेकर बनी उनकी फ़िल्म बुद्धा इन अ ट्रैफ़िक जाम ने भी काफ़ी सुर्ख़ियां बटोरी थीं। द कश्मीर फाइल्स उसी कड़ी का एक हिस्सा नज़र आती है, जिसमें ग्राउंड की कुछ कहानियों को पर्दे पर दिखाया गया है।
क्योंकि कहानी कश्मीर की है, ऐसे में विज़ुअल का जादू दिखाना आसान रहा इसलिए सिनेमेटोग्राफ़ी यहां पर नंबर मार जाती है। फ़िल्म में कुछ हिस्से ऐसे भी हैं, जिसमें उस नरसंहार के दर्द को बिखेरा गया है।

सेंसर बोर्ड में भी विवेक अग्निहोत्री को काफी संघर्ष करना पड़ा। जानकारी के अनुसार एक खूँखार आतंकी के घर भारत के एक पूर्व प्रधानमंत्री को दिखाए जाने वाले दृश्य को भी हटा दिया गया। एक टेलीविजन चैनल के लोगों को हटाने के साथ-साथ फिल्म में दो दिन जगह दिखाए गए पोस्टर्स में से ‘रेप’ शब्द को भी ब्लर कर दिया गया। जहाँ भी ‘हिन्दू’ या ‘पंडित’ शब्द के साथ कुछ अपशब्द थे, उन्हें हटा दिया गया है। स्पष्ट है, इस्लामी कट्टरपंथियों की भाषा को दिखाने के लिए फिल्म में इनका इस्तेमाल हुआ होगा।
साथ ही ‘डिस्को CM’ वाले शब्द को भी फिल्म से सेंसर बोर्ड ने हटा दिया है। एक यूनिवर्सिटी, जिसे फिल्म में दिखाया गया है – उसका नाम JNU से हटा कर ‘ANU’ रख दिया गया
निर्देशक विवेक अग्निहोत्री को सेंसर बोर्ड ने उन्हें फिल्म में कट्स की लंबी सूची थमाई थी, जिसके बाद उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा।

 

 

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