कौशल सिखौला : विपक्ष का घिनौना रूप…!
संसद का एक और सत्र बर्बाद हो गया । 166 घंटे कोई कामकाज नहीं हो पाया । बात सिंदूर ऑपरेशन से शुरू हुई थी , SIR पर खत्म हुई । यह जरूर है कि हर बार की तरह सरकार के लगभग सभी बिल पास हो गए । लेकिन देश के मतदाताओं ने अपने प्रतिनिधियों को जिस काम के लिए वोट दिए थे , वह काम तो हुआ ही नहीं , उल्टे सरकारी कामकाज में खासी बाधा पड़ी।
यह इसी सत्र की बात थोड़े ही है , बताइए , 11 सालों में सत्र चला कौनसा ? हम सन 1968 से अखबारों में संसदीय कार्रवाई नियमित रूप से पढ़ते आए हैं । विपक्ष का इतना घिनौना रूप कभी नहीं देखा । जब से संसद की कार्रवाई टीवी पर आने लगी है , तब से प्रायः सभी कार्रवाई देखते हैं । अब क्या बताएं मोदी के आने के बाद तो विपक्ष को विपक्ष के रूप में कभी देखा ही नहीं ।
कल एक निर्दलीय सांसद ने आवाज उठाई कि जिन सांसदों ने लोकसभा सत्र का बहिष्कार किया उन्हें इन दिनों का वेतन नहीं मिलना चाहिए । बात ठीक है , वेतनभोगी यदि ऑफिस नहीं जाते तो क्या उन पर कार्रवाई नहीं होती ? सासंद विधायक भी वेतन और भत्ता भोगी हैं । जब वेतन बढ़ाने की बात आती तो कोई नहीं कहता कि वह इसके खिलाफ है । तब तो सभी तमाम विरोध कूड़ेदान में डालकर सब एक हो जाते हैं ।
यह ठीक है कि संसद का सत्र चलने पर प्रतिदिन सैकड़ों करोड़ खर्च होते हैं । केवल संसद के ही नहीं , पूरे प्रदेशों के तमाम दफ्तरों के । ये दफ्तर खुले रक्खे जाते हैं ताकि संसद में अचानक कोई जानकारी न मांग ली जाए । मांगने पर तत्काल रिपोर्ट भेजनी होती है । मतलब जब सत्र चलता है तब देश की तमाम सरकारी मशीनरी सजग रहती है जिस पर भारी खर्च होता है । ऐसे में जब संसद का बहिष्कार होता है तो नुकसान देश का होता है ।
राजनीति में विरोध और विरोध की पराकाष्ठा हो गई है । अब वे जमाने गए जब चुनाव हारने वाला पांच साल मेहनत करता था , प्रतीक्षा करता था । सदन में भी विपक्षी दल सार्थक और तार्किक भूमिका निभाते थे । एक बार फिर बता दें कि विपक्ष में बैठी पार्टियां परस्पर सौहार्द नहीं खोती थी । आज की घोर गिरावट देखिए , सत्तारूढ़ पार्टी से घोर घृणा के कारण लोग पीएम की चाय पार्टी में नहीं जाते ।
पार्टी छोड़िए साहब लाल किले के स्वाधीनता दिवस समारोह का बहिष्कार कर देते हैं , उनकी नेमप्लेट लगी कुर्सियां खाली पड़ी रह जाती हैं । देखिए विपक्ष में कांग्रेस के साथ आज जितनी भी पार्टियां हैं उन सभी ने दशकों तक जनसंघ और बीजेपी के साथ मिलकर विपक्ष की भूमिका निभाई है , कांग्रेस के खिलाफ मिलीजुली सरकारें बनाई हैं । संसद से बहिर्गमन तब भी होते थे परन्तु अध्यक्ष के आसन पर चढ़ जाने की हिम्मत कोई नहीं जुटाता था ।
आज क्या हाल हैं किसी से छिपा नहीं । संसद सत्रों को लगातार बर्बाद करने का मतलब है , लोकतंत्र से खिलवाड़ करना । मानसून सत्र के साथ भी यही हुआ । असहमति बुरी नहीं , तरीका बुरा है , बहुत ही बुरा है । जो लोग संविधान का पॉकेट बुक संस्कार जेब में डाले फिरते हैं उन्हें पढ़ना चाहिए कि संसदीय मर्यादाओं के लिए संविधान में लिखा क्या है ? …..कौशल सिखौला
