देवेंद्र सिकरवार : तलवार की धार पर विदेशनीति.. विदेश नीति विधवा हो गई और सारे गुंडे उसे छेड़ने लगे
विदेश नीति के क्षेत्र में भारत में ऐसा नाजुक समय आजादी के बाद से कभी नहीं आया क्योंकि आज से पहले विश्व ने हमको इतना ताकतवर माना नहीं और न सीरियस लिया था।

सोवियत संघ के विघटन से पूर्व सदैव हमारे सामने कई विकल्प उपस्थित थे इसलिए नेहरू बहादुर कभी स्टालिन के तलवे चाटते तो कभी माओ की मुस्कान से घायल होते तो कभी कैनेडी के सामने फौजी मदद के लिए गिड़गिड़ाते।
विदेश नीति के विशेषज्ञ इसी को ‘गुट निरपेक्षता’ कहते थे।
लेकिन मैं इसे मजबूरी की मार की विदेशनीति कहता हूँ और इसके लिए नेहरू को इतना दोष भर देता हूँ कि माओ, स्टालिन और कैनेडी, सभी का बिस्तर गरम करने की बजाय ‘एक से ही ब्याह’ कर लिया होता।
उनकी बेटी इंदिरा अपेक्षाकृत अधिक व्यवहारिक थी और उसने ठीक ही सोवियत संघ से गठबंधन कर लिया।
समस्या तब शुरू हुई जब सोवियत संघ का विघटन हुआ और भारतीय विदेश नीति विधवा हो गई और सारे गुंडे उसे छेड़ने लगे।
फिर भी नरसिंहराव और बाद में अटल जी ‘अँखियों के इशारे’ दे देकर, अमेरिका को उल्लू बनाकर अपना काम निकालते रहे। अटल जी के विदेश मंत्री जसवंत सिंह, जो मेरी निगाह में भारत के सर्वश्रेष्ठ विदेशमंत्री और वर्तमान विदेशनीति के शिल्पी थे, ने अमेरिका को इतना शीशे में उतारा जिसकी तुलना कौटिल्य से ही की जा सकती है।
लेकिन सरदारजी ने परमाणु समझौते की प्रारंभिक दृढ़ता के बाद पूरी तरह अमेरिका के सामने समर्पण कर दिया। यहाँ तक कि 26/11 जैसे वीभत्स पाकिस्तानी हमले पर भी अमेरिका के इशारे पर सिर झुकाकर बैठ गये।
मोदीकाल में विदेशनीति के दो चरण स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं –
1)ऑपरेशन सिंदूर से पहले की विदेश नीति
2)ऑपरेशन सिंदूर के बाद की विदेश नीति
पहले चरण में मोदी सरकार अमेरिकी थिंक टैंक को समझाने में सफल रही कि चीन को रोकने के लिए भारत को अमेरिका की उतनी जरूरत नहीं जितना अमेरिका को भारत की जरूरत है।
और अमेरिकी थिंक टैंक को शीशे में उतारने के बाद भारत चुपचाप अपना आर्थिक व सैन्य विकास करता रहा।
सत्य तो यह है कि अमेरिका छोड़िये स्वयं हम भारतीयों को ही यह नहीं पता चला कि हम कितने ताकतवर हो चुके हैं।
लेकिन ऑपरेशन सिंदूर में जिस तरह पाकिस्तान आखिरी तीसरे दिन की एडवांस आर्म सिस्टम की लड़ाई में चालीस मिनिट में घुटनों पर आ गया और अंतर्राष्ट्रीय सैन्य हलकों की फुसफुसाहटों को सत्य मानें तो नूर खान बेस पर अमेरिकी अड्डे को पहुंचे भयंकर नुकसान ने अमेरिकी तंत्र को भी हिला दिया।
यही कारण है कि ढाई दिन तक युद्ध से बेपरवाह रहने वाला अमेरिकी तंत्र हायपर एक्टिव हुआ और उसने पाकिस्तान पर दवाब डालकर डीजीएमओ के जरिये भारत के डीजीएमओ से सीज फायर की भीख मंगवाई।
चूँकि अमेरिकी प्रतिष्ठान को डर था कि भारत को असीमित सैन्य प्रतिष्ठा मिल सकती है इसलिए भारत द्वारा सीजफायर के आग्रह पर विचार के बीच ट्रम्प ने ‘क्रेडिट-क्रेडिट’ खेलना शुरू कर दिया।
अमेरिका की यह पुरानी आदत है।
द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर की शक्ति को तोड़ा था रैड आर्मी ने लेकिन क्रेडिट ले उड़ा अमेरिका। अस्तु!
यों तो पहले ही हथियार व मेडिसिन वाला अमेरिकी डीप स्टेट बांग्लादेश में अपना खेल शुरू कर चुका था लेकिन अब डोनाल्ड ट्रम्प भी खुलकर विरोध में आ गये।
ट्रम्प का यह बदला व्यवहार एपस्टीन कांड की ब्लैकमैलिंग का नतीजा है या उनका अपना व्यापार बढ़ाने का प्रयास या वाकई में अमेरिकी नीति, यह तो एकदम नहीं कह सकते लेकिन फिलहाल अमेरिकी सत्ता पूरी तरह भारत के दमन पर उतारू है।
जो लोग यह प्रश्न करते हैं कि सफलता के बाद भी भारत ने सीजफायर क्यों मान लिया, उन्हें यह बताना चाहता हूँ कि युद्ध अपनी सुविधा के अनुसार, अपनी परिस्थितियों में लड़ने चाहिए न कि व्यर्थ की भावनाओं में बहकर।
लेकिन असली समस्या तो अब शुरू हुई है।
अब भारत के सोशक मीडिया विशेषज्ञों और उनके उतने ही समझदार विशेषज्ञ राहुल गांधी की मानें तो मोदी को ट्रम्प को तू तड़ाक करके जवाब देना चाहिए लेकिन इन मूर्खो को यह नहीं पता कि यह न केवल असभ्यता है बल्कि ऐसा कदम भारत को एकपक्षीय रूप से रूस की गोद में धकेल देगा और रूस अब और कुछ नहीं बस चीन आश्रित देश है।
यानि अमेरिका से दूर जाने पर हम पूरी तरह ‘रूस-चीन’ पर निर्भर हो जाएंगे और फिर दोंनो विशेषतः चीन के बंधुआ बन जाएंगे।
यही कारण है कि भारत कड़ी प्रतिक्रिया देने से बच रहा है लेकिन चीन व रूस के नेताओं से मिलकर अमेरिका को ‘डराने’ का प्रयत्न कर रहा है।
-जब तक भारत अपना जैट इंजन नहीं बना लेता,
-जब तक भारत छठी पीढ़ी का विमान और 65 स्क्वार्डन नहीं बना लेता,
-जब तक भारत रेयर अर्थ के मामले आत्मनिर्भर नहीं हो जाता,
-जब तक भारत कम से कम 12 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था नहीं बन जाता है और यूरोप व अमेरिका की अर्थव्यवस्था को रिवर्सिबल प्रॉफिट बेस्ड नहीं बना देता,
तब तक भारत के लिए यह मौन आधारित ‘संतुलन-प्रतिसंतुलन’ की विदेश नीति सर्वोत्तम है।
आगामी बीस दिन बहुत महत्वपूर्ण होने वाले हैं।
