सुरेंद्र किशोर : आपातकाल की बर्बरता की याद में.. जीने तक का अधिकार नहीं था आपातकाल में लोगों को

इमरजेंसी (1975-77) में इंदिरा गांधी सरकार ने आम लोगों के जीने तक का संवैधानिक अधिकार भी छीन लिया था।
तब के भयभीत सुप्रीम कोर्ट ने जीने के अधिकार को छीन लेने के सरकारी कुकृत्य को गलत नहीं ठहराया था।

इंदिरा गांधी ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि चुनावी भ्रष्टाचरण के आरोप में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 जून 1975 को इंदिरा गांधी की लोक सभा की सदस्यता समाप्त कर दी थी।
उस आदेश के खिलाफ जब इंदिरा ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की तो सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी कोई खास मदद करने से इनकार कर दिया था।
उसके बाद इंदिरा गांधी ने इमर्जेंसी लगाकर पूरे देश को एक बड़े जेलखाने में बदल दिया।
साथ ही, लोगों के जीने का अधिकार भी छीन लिया।इस तरह उन्होंने अपनी गद्दी बचाई थी।जीने का अधिकार अंग्रेजों ने भी नहीं छीना था।अंग्रेजी शासनकाल में कोई भारतीय किसी की हत्या के खिलाफ कोर्ट जा सकता था।

अब एक बार फिर याद कर लीजिए उन काले दिनों को ————-
भारत के एटार्नी जनरल नीरेन डे ने 15 दिसंबर 1975 को सुप्रीम कोर्ट में पांच न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष कहा था कि ‘‘यदि शासन आज किसी की जान भी ले ले, तो भी यह अदालत कुछ नहीं कर सकती।’’
इसके बाद देश की सर्वोच्च अदालत ने नीरेन डे के इस तर्क से सहमति जताते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण के उन मामलों को खारिज कर दिया जो हाईकोर्ट के बाद उसके पास विचारार्थ आए थे।
उससे पहले देश के नौ उच्च न्यायालयों ने बंदियों के मौलिक अधिकार के पक्ष में राय दी थी।याद रहे कि 25 जून 1975 को आपातकाल लगाने के साथ ही देश के एक लाख से अधिक लोग जेलों में ठंूस दिए गए थे।गिरफ्तारी के खिलाफ अदालत जाने पर रोक लगा दी गयी थी।(इन पंक्तियों का लेखक फरार था।आपातकाल में बड़ौदा डायनामाइट केस के सिलसिले में सी.बी.आई. इन पंक्तियों के लेखक की तलाश कर रही थी।)
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ए.एन.राय की अध्यक्षता वाली पीठ ने 28 अप्रैल 1976 को यह निर्णय दिया कि राष्ट्रपति के 27 जून 1975 के आदेश के आलोक में किसी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह संविधान के अनुच्छेद – 226 के तहत किसी हाईकोर्ट में अपनी गिरफ्तारी के खिलाफ बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर सके।पांच सदस्यीय पीठ के अन्य न्यायमूर्ति थे एच.एम.बेग, वाई.वी.चंद्रचूड़,पी.एन.भगवती और एच.आर.खन्ना।
सिर्फ जस्टिस खन्ना बहुमत के जजमेंट से असहमत थे।श्री खन्ना को इसकी सजा मिली।
वरीय होने के वावजूद उनसे जूनियर एच.एम.बेग को बाद में मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया।
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इमर्जेंसी में जीने तक के अधिकार को हक छीन लेने वाले अपने जजमेंट के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तो सन 2011 में अपनी गलती मान ली।लेकिन इमर्जेंसी लगाने वालों ने सत्ता से हटने के बाद क्या कहा ?!!

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