दिलीप सी मंडल : बाबा साहब.. धर्म का कभी निषेध नहीं किया.. भारतीय धर्म अपनी बुराइयों से मुक्त हो, पर लोग बाहर न जाएँ।
बाबा साहब की भारतीय धर्मों में अखंड आस्था थी। उन्होंने धर्म का कभी निषेध नहीं किया। यहां तक कि संविधान बनाए जाने के क्रम में भी उन्होंने भारत की प्राचीन धार्मिक परंपराओं का ध्यान रखा और उन परंपराओं से प्रेरणा ली।
संविधान सभा का उनका अंतिम भाषण (25 नवंबर 1949) बहुत महत्वपूर्ण है। यहां वे संविधान सभा की पूरी बहस का निचोड़ प्रस्तुत कर रहे हैं:
“यह नहीं कहा जा सकता कि भारत को संसद या संसदीय प्रक्रिया की जानकारी नहीं थी। बौद्ध भिक्षु संघों के अध्ययन से पता चलता है कि वे न केवल संसद की तरह कार्य करते थे, बल्कि संघों को आधुनिक समय की संसदीय प्रक्रियाओं की पूरी जानकारी थी और वे उन्हें मानते भी थे। उनके पास संसद में बैठने की व्यवस्था, प्रस्ताव, संकल्प, कोरम, पार्टी अनुशासन (व्हिप), मतों की गिनती, गुप्त मतदान, अविश्वास प्रस्ताव, वैधीकरण (रेग्युलराइज़ेशन), पूर्व निर्णय (रेस जुडीकाटा) आदि के नियम थे। यद्यपि ये संसदीय नियम बुद्ध ने संघ की बैठकों में लागू किए थे, परंतु संभवतः उन्होंने ये नियम अपने समय के राजनीतिक सभाओं से लिए थे, जो देश में उस समय कार्यरत थीं।”
– संविधान सभा और अब संसद व विधानसभाओं की कार्यविधि में भी ये परंपराएं मौजूद हैं।
पूरा भाषण हर बड़े पुस्तकालय और सरकारी व संसद की वेबसाइट पर मौजूद है।
ये भी न भूलें कि कोई भी समाज सुधारक – महात्मा फुले, शाहूजी ही नहीं, पेरियार ने भी समाधान के तौर पर इस्लाम या ईसाई धर्म को स्वीकार नहीं किया। सब अपने घर यानी भारतीय परंपरा में बने रहे।
ये सभी चाहते थे कि भारतीय धर्म अपनी बुराइयों से मुक्त हो। पर लोग बाहर न जाएँ।
-श्री दिलीप सी मंडल के पोस्ट से साभार।
