डॉ. आनंदवर्द्धन दिल्ली में डॉ. बीआर आंबेडकर विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ हेरिटेज रिसर्च एंड मैनेजमेंट में अस्सिटेंट प्रोफेसर हैं। मध्यप्रदेश की जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी की पहल पर उनका व्याख्यान भोपाल में हुआ। सवा घंटे के धाराप्रवाह व्याख्यान का विषय था-‘धर्मयोद्धा बिरसा।’

यह बिरसा मुंडा की कथा है। 15 नवंबर 1875 में वर्तमान झारखंड के छोटा नागपुर इलाके के एक गरीब किसान परिवार में पैदा हुए बिरसा की जिंदगी कुल 25 साल की थी। उन्हें 9 जून 1900 को रांची जेल में उन्होंने सजा के दौरान आखिरी सांस ली। लेकिन इतनी कम उम्र में अब से सवा सौ साल से भी पहले के गरीब, दमित और पिछड़े हुए भारत के भी दुर्गम इलाके का यह नौजवान कुछ ऐसा करके गया, जिसकी कथा सुनने मात्र से धमनियों का रक्त प्रवाह तीव्र हो जाता है।

अंग्रेजों के समय ईसाई मिशनरियों ने इस इलाके में अपनी जड़ें अच्छी तरह फैला ली थीं। गांवों में ही नहीं, अपने परिवार में ही उन्हें फ्रांसिस मुंडा और डेविड मुंडा के दर्शन होने लगे। मिशनरी स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही प्रतिभाशाली बिरसा ने देश की दुर्गति का अनुभव किया और वहीं खुलकर खिलाफ हो गए। वे ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ अपने जनजातीय समूह में जिस तरह सक्रिय हुए, वह हमेशा साधनों का रोना रोने वाले निकम्मों की जमात के लिए देखने जैसा है। अथाह ऊर्जा और नेतृत्व की मौलिक दृष्टि से भरे बिरसा का नाम बृहस्पति का घिसा हुआ रूप है। वे इसी दिन पैदा हुए थे और जिस दिन संसार से गए, वह भी बृहस्पतिवार ही था।

वह 1857 में देश के पहले स्वाधीनता संग्राम के बाद के दशक थे, जब अंग्रेजों ने हिंसक बल के आतंक पर भारतीयों की आत्मा को कुचलने का प्रयास किया था। मगर आग बुझी कहीं नहीं। धुआं निकलता ही रहा और वह भीतर सुलगती अग्नि का पता हर कहीं देता रहा। बिरसा एक लपट की तरह आए, जिसकी आंच अंग्रेजों को लगते देर नहीं लगी। जनजातीय समाज को एकत्रित करके अंग्रेजी फौज और मिशनरियों के धर्मांतरण के खिलाफ जागरूकता और संघर्ष के लिए प्रेरित करने वाली उनकी आवाज दूर तक गई।

यह बेहद कड़वी सच्चाई है कि आजादी के बाद हमारे शिक्षा तंत्र में बिरसा जैसे महापुरुषों की चर्चा या तो की नहीं गई या बहुत धीमे स्वर में स्थानीय स्तर तक ही हुई। शासन की शपथ के बाद आजादी की लड़ाई का अकेला एक महाटेंडर कांग्रेस के नाम से खुल गया। सत्ता में रहकर वह स्वाधीनता संघर्ष की स्वयंभू बिल्डकॉन बन गई। गांधी-नेहरू उसके चेयरमेन और एमडी बन गए। देश की इमारतों, योजनाओं, सड़कों, चौराहों और संस्थानों पर उनके नाम के ही तौलिया और रूमाल डाल दिए गए। मूर्तियों का जाल बिछा दिया गया।

बिरसा जैसी लपटों को तो नजर ही आने नहीं दिया गया। वे हाशिए पर कहीं दूर किसी मेगा प्रोजेक्ट में तगारी ढो रहे मामूली श्रमिक नजर आते हैं। मगर जनजातीय स्मृतियों ने बिरसा को भगवान बनाया। उनकी प्राण प्रतिष्ठा एक लोकदेवता के रूप में हो गई। समाज के ह्दय की गहराई में वैसी प्रतिष्ठा किसी ठेकेदार को नहीं मिली। आज जब जनजातीय समाज को भारत की सनातन धारा से तोड़ने के कुचक्र चल रहे हैं, बिरसा एक बार फिर हमारी ताकत बन सकते हैं।

एक सेनानी के रूप में बिरसा मुंडा के योगदान और संघर्ष के बारे में थोड़ा बहुत सब लोग जानते हैं। लेकिन डॉ. आनंदवर्द्धन बिरसा के जीवन के दूसरे आयाम जब बताते हैं तो लगता है कि जनजातीय समाज ने बिरसा को क्यों अपना ‘धरती आबा’ कहा होगा। बिरसा अपने समाज में भारत की सनातन आत्मा को झकझोरते हैं। वे आंगन में तुलसी लगाने के लिए प्रेरित करते हैं, वे जगन्नाथ की यात्रा के लिए उपनयन कराते हैं और उपनयन को सनातन संस्कृति के एक अनिवार्य संस्कार के रूप में प्रचारित करते हैं।

जब वे यात्रा के लिए पीतांबर वस्त्र पहनकर निकलते हैं और जगन्नाथ पहुंचते हैं तो 15 दिन तक उपवास करते हैं। वे भगवान से अपने समाज के लिए शक्ति का आव्हान करते हैं और लौटकर मांस-मदिरा के खिलाफ खड़े होते हैं। अपने भोजन के लिए जीव हत्या पाप है और जीवनयापन के लिए प्रकृति ने पर्याप्त दिया हुआ है। ऐसी उनकी वाणी सुनकर वह समाज हतप्रभ होकर विचार शुरू करता है। उनके जीवन में महादेव और चंडी की उपासना के रूपक डॉ. आनंदवर्द्धन से सुनते हुए एक श्रोता के सामने बिरसा एक विराट अवतार के रूप में सामने आते हैं। रामचरित मानस का रचयिता उनके मानस को प्रभावित करता है। और वे अपने समाज को भारत के गौरव की महागाथाओं का परिचय और गहरा कराते हैं। धर्मांतरित स्वजनों के प्रति उनका दृष्टिकोण कठोर है, जो अपनी पहचान को खोकर साम्राज्यवादी ताकतों के इशारों पर अपने देश और अपनी संस्कृति की ही जड़ों को काटने में लगे थे।

वे कुरीतियों से मुक्त सात्विक जीवन जीने और राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए प्राणों की बाजी लगाने का आव्हान करते हैं। तोपों और बंदूकों के मुकाबले परंपरागत धनुषबाण और कुल्हाड़े के गांव-गांव मंे उत्पादन पर पैनी दृष्टि रखते हैं ताकि आरपार की लड़ाई में समाज का कोई हाथ अस्त्रों से खाली और अप्रशिक्षित न रहे। वे कुशल योद्धाओं की एक अनुशासित सेना खड़ी कर देते हैं, जिसमें भारतीयता की भावना और सनातन आत्मा का प्रकाश जगमगाता है। एक महायोद्धा के रूप में बिरसा का वर्णन सहयाद्री के दुर्गम पहाड़ों और जंगलों में मावलाओं के बीच ऊर्जा जगाने वाले शिवाजी की याद दिला देता है, जिन्होंने अपने समय की एक और साम्राज्यवादी इस्लामी आतंक की लहर का मुकाबला किया था। बिल्कुल उसी अंदाज में बिरसा झारखंड के घने जंगलों में ब्रिटिश हुक्मरानों की नींद उड़ाने का आयोजन करते हैं।

मुझे ज्ञात नहीं बिरसा के किरदार को सिनेमा में रचा गया या नहीं। मगर डॉ. आनंदवर्द्धन को सुनने के बाद मुझे लगता कि आज की तारीख में भारतीय सिनेमा का एक ही निर्देशक है, जो परदे पर उनके साथ न्याय कर सकता है। बिरसा की कहानी में इतना कुछ है कि राजामौली के सिवाय कोई उसे छूने की भी योग्यता नहीं रखता। अकादमी के निदेशक डॉ. धर्मेंद्र पारे को मेरा सुझाव होगा कि कैसे भी यह कथा राजामौली को सुनाने का प्रबंध किया जाए। बिरसा किसी मुंडा नाम की दूरदराज जनजाति के धरती आबा नहीं हैं। उनका विराट व्यक्तित्व पूरे भारत की प्रेरणा बनना चाहिए। वे हम सबके पूजनीय धरती आबा हैं। एक देवता, जो धरती पर उतरा…

 

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