प्रसिद्ध पातकी : राधा_ भारतीय आख्यानों का एक संगीतमय मौन

कभी-कभी मुझे शालिग्राम और शिवलिंग को देख बहुत आश्चर्य होता है। भगवान के इन दोनों स्वरूपों का रहस्य समझना आसान नहीं है क्योंकि ये साकार होकर भी गहरे निराकार हैं। ठोस साकार, पर कोई रूप नहीं। हमारी श्रद्धा इन्हें तमाम रूप देकर भजती है।

रोहिणी नक्षत्र वृष राशि (वृषभानु सुता) में पड़ता है। वैसे भगवान कृष्ण का जन्म लग्न और जन्मराशि, दोनों ही वृष हैं। इसके ठीक सामने है, वृश्चिक राशि। वृश्चिक राशि के एक नक्षत्र का नाम है, ‘‘अनुराधा’’। यह नाम बड़े पते का है। अनु का एक मतलब होता है छोटा। यानी छोटी राधा। कृष्ण भगवान के जन्मांग में सप्तम भाव (विवाह का भाव) में वृश्चिक राशि आती है… 

 

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पर एक और रहस्यमय शक्ति है, जिनका कोई ओर-छोर नहीं मिलता। यह शक्ति परम संगीतमय है किंतु इसे लेकर हमारे यहां एक गहरा मौन दिखाई देता है। यह शक्ति हैं, राधा। भगवान कृष्ण की अह्लादिनी शक्ति। शरतचन्द्र ने अपने किसी उपन्यास में लिखा है कि प्रेम को समझना हो तो मिलन नहीं राधा के शताधिक वर्षीय वियोग को समझो। प्रेम वहाँ निखरकर सामने आता है।

-श्री प्रसिद्ध पातकी

बचपन से ही मुझे इस बात पर गहरा आश्चर्य होता था कि राधा को लेकर हमारे शास्त्र मौन क्यों हैं? चाहे महाभारत हो या भागवत, दोनों कृष्ण प्रिया राधा पर मौन साध गये हैं। बाद में विद्वान आचार्यों और रसिकाचार्यों ने व्याकरण एवं युक्तियों के सहारे इस मौन की ग्रन्थियों को खोलने के तमाम प्रयास किए किंतु मुझे तो कोई संतोषजनक तर्क नहीं मिला। क्या महर्षि व्यास और शुकदेव इन व्याकरणाचार्यों और रसिकाचार्यों से उन्नीस थे, जिन्होंने सब कुछ जानते हुए राधारानी के लिए मौन साध लिया?

और तौर और भगवान कृष्ण, जिनकी तमाम पटरानियाँ थी, उनके प्राचीन विग्रहों के साथ बायें स्थान को प्राय: रिक्त रखा जाता था। माना जाता था कि इस रिक्त स्थान पर राधा विराजमान हैं और यदि आपकी दृष्टि है तो उसे देख लीजिए।

राधा, वास्तव में प्रेम की ऐसी जीवंत देवी हैं जिन्होंने अपने अस्तित्व को लगभग मिटा दिया। और इसी कारण वह प्रेम की जीवंत मिसाल बन गयीं। लोक जीवन की एक कहानी मुझे बहुत अच्छी लगती है। बरसाने में राधारानी अपने एक तोते को सिखा रही थीं कि बोल मिट्ठू—‘‘राधा-राधा।’’ इस बीच उनकी सहेली आ गयी और बोली, राधा ये क्या कर रही है। राधा ने कहा कि यह तोता उड़कर नंदगांव जाएगा। इस पर सहेली बोली तो फिर उसे ‘‘कृष्ण-कृष्ण’’ क्यों नहीं सिखाती। राधा ने कहा कि कान्हा, ‘‘कृष्ण-कृष्ण’’ सुनकर नहीं ‘‘राधा-राधा’’ सुनकर प्रसन्न होगा। इसलिए मैं इसे यह सिखा रहीं हूं।

राधा कृष्ण प्रेम में इतना खो गयी कि उनके लिए कृष्ण की शारीरिक उपस्थिति भी मानों गौण हो गयी। कहते हैं कि महाभारत के बाद माता कुंती के साथ कई लोग कुरुक्षेत्र गये थे। इनमें वृषभानु सुता भी थीं। कुरुक्षेत्र जाकर भी वह भगवान कृष्ण से मिलने नहीं गयीं। इसके विपरीत जब भगवान कृष्ण की पटरानियों को पता चला कि राधारानी आयी हैं तो वे स्वयं जाकर उनसे मिलीं। वहां बातचीत के नाम पर मौन का वितान तना रहा। रुक्मिणी देवी ने उन्हें गर्मागर्म दूध का बेला दिया। राधारानी अपने बंसीवारे का ध्यान कर तालु को झुलसाने वाले उस गर्म दूध को पी गयीं। बाद में जब रात को रुक्मिणी भगवान के पैर दबाने गयीं तो वह गहरी पीड़ा से भर उठी क्योंकि उन्होंने देखा कि केशव के पैरों में छाले थे।

अधिक पुरानी बात नहीं हैं। 1970 के दशक तक ब्रज में ‘राधे-राधे’ का संबोधन केवल वृंदावन एवं बरसाने तक ही सीमित थी। शेष जगह तो हमारे लाला ही संबोधन में आते थे। यह था राधारानी के प्रति हमारे समाज का गोपन भाव। किंतु आज राधारानी की जयकार चारों ओर होती है।

भारतीय आख्यानों में राधारानी को लेकर यह जो मौन है, उसका अनावरण कुछ-कुछ ज्योतिष में होता है। भचक्र में जो प्रमुख 27 नक्षत्र हैं, उनमें विशेष है, रोहिणी। वैसे तो चंद्रमा सभी 27 नक्षत्रों के पति हैं किंतु उन्हें विशेष लगाव है, रोहिणी से। रोहिणी शब्द रोहण से बना है, जिसका अर्थ ऊपर उठना। देखा जाए तो नक्षत्र तारों का समूह होता है। रोहिणी नक्षत्र के तारे बहुत ही चमकदार होते हैं। मेरा मानना है कि रोहिणी ही राधा है। इनके प्रेम में भगवान कृष्ण के चरित्र का ऐसा आरोहण हुआ कि वे जगत में प्रेम के प्रतीक बन गये। रोहिणी नक्षत्र वृष राशि (वृषभानु सुता) में पड़ता है। वैसे भगवान कृष्ण का जन्म लग्न और जन्मराशि, दोनों ही वृष हैं। इसके ठीक सामने है, वृश्चिक राशि। वृश्चिक राशि के एक नक्षत्र का नाम है, ‘‘अनुराधा’’। यह नाम बड़े पते का है। अनु का एक मतलब होता है छोटा। यानी छोटी राधा। कृष्ण भगवान के जन्मांग में सप्तम भाव (विवाह का भाव) में वृश्चिक राशि आती है। अर्थात बात को थोड़ा खींच दिया जाए तो भगवान मुकुंद की जितनी पटरानियां थीं, वे सब अनुराधा थीं। राधा नहीं।
हो सकता है कि यही कारण रहा कि हमारे पूर्वज मनीषियों ने भगवानक कृष्ण की प्रतिमा के बायें हाथ वाले स्थान को रिक्त रखना पसंद किया। राधा के स्थान पर भला अनुराधा कैसे आसीन हो सकती हैं?

पुनश्च: पोस्ट लिखने के कई घंटे बाद यह बात ध्यान आयी कि आज भी अनुराधा नक्षत्र है। यानी आज चंद्रमा अनुराधा नक्षत्र में संचरण कर रहे हैं। तो है ना गजब की बात!!!

राधा अष्टमी की राम राम।।

-चित्र इंटरनेट से साभार।

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