भूपेंद्र सिंग : मोदी युग.. कभी कमजोर कहने वाला अमेरिका भारत को दुनिया का सबसे बड़ा गुंडा क्यों मान रहा..!

राजा भैया के ऊपर बहन जी के शासन में एक से बढ़कर एक कार्रवाई हुई। उनके संपत्ति का एक एक कोना छान मारा गया। माहौल बनाया गया कि राजा भैया अपने तालाब में मगरमच्छ पालते हैं और लोगों को मारकर उन्हें खिला देते हैं। ऐसा लग रहा था राजा भैया एक नेता अथवा बाहुबली से आगे बढ़कर बॉलीवुड के विलेन हों, खासकर अमरीश पूरी। राजा भैया ने इस पर कभी बहुत खुलकर सफ़ाई नहीं दी अथवा दी भी तो इस लहजे में कि आपको इस बात से कभी अविश्वास न होने पाये कि उनके यहाँ ऐसा होता था। कुल मिलाकर उस समय राजा भैया के ख़िलाफ़ पुलिस ने जो माहौल बनाया, उससे समाज के राजा भैया के प्रति एक ख़ौफ़ जो पैदा हुआ, शायद उसे जान बूझकर राजा भैया ने कभी क्लियर नहीं करना चाहा। बहन जी की सरकार चली गई, तमाम कार्रवाई भी जो होनी थी वह समाप्त हो गईं, लेकिन राजा भैया को फ़साने के लिए जो कहानियाँ बनाई गईं, वह अभी भी मार्केट में ज़िंदा हैं। इन कहानियों के ज़िंदा रहने से राजा भैया का माहौल बना हुआ है।

Veerchhattisgarh

भारत पर अमेरिका में पहले 25% प्राइमरी टैरिफ़ लगाया, फिर समझौते में भारत पर दबाव बनाना चाहा, भारत नहीं दबा, तो रूस से तेल ख़रीदने के नाम पर 25% सेकेंडरी टैरिफ़ भी लगा दिया। उसके बाद भारत सरकार यूरोपियन अथवा पूर्वी एशिया के देशों की तरह सरेंडर करने के बजाय जवाब देने का निर्णय किया और कहा कि पहली बात तो यह कि भारत ने रूस से तेल इसलिए खरीदना शुरू किया क्यूंकि विश्व में तेल की क़ीमतों को स्थिर रखने के लिए अमेरिका ने ही भारत से कहा था कि रूस से तेल ख़रीदकर भारत विश्व में स्थिरता रखे और एक कदम आगे बढ़कर यह भी बता दिया कि ख़ुद यूरोप और अमेरिका रूस के साथ व्यापार कर रहे हैं। अब जब अतिरिक्त टैरिफ़ का भय दिखाया गया तो अमेरिका को लगा कि बैक चैनल से प्रयास किया जाएगा, भारत गिड़गिड़ाएगा और अपने शर्त पर समझौता करेंगे। भारत के कृषि, डेयरी और मछली सेक्टर को बर्बाद करने के लिए अमेरिका का दबाव था, लेकिन भारत अपने जगह से नहीं हिला। अब आप चाहे ब्लूमबर्ग चैनल खोलिए, चाहे फॉक्स चैनल या सीएनएन हर जगह केवल एक डिबेट दिखाई पड़ रही है और वो है भारत। एक सप्ताह पहले तक भारत के इकॉनमी को डेड कहने वाला वाइट हाउस अब बड़े बड़े चैनलों पर बैठकर रूस यूक्रेन वॉर को “मोदी वार” कह रहे हैं। यह बात कोई ऐरा गैरा नहीं कह रहा, सीधे सीधे ट्रम्प का व्यापार सलाहकार कह रहा है तो कोई ट्रम्प के कैबिनेट का व्यक्ति कह रहा है। व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने यहाँ तक कह दिया कि हम जब भारत से कहते हैं कि रूस से तेल ख़रीदना बंद करो तो वो कहते हैं कि हम तो संप्रभु राष्ट्र हैं, हम किसी और की क्यों सुने? कुल मिलाकर पीटर यह कहना चाह रहे हैं कि जिस प्रकार की क्लास ट्रम्प में यूरोप के नेताओं की ली, वैसी ही क्लास वह भारत के नेताओं की भी ले और भारत उसे स्वीकार कर ले। ट्रंप कैबिनेट के एक महत्वपूर्ण नेता ने कहा कि रूस यूक्रेन के शांति का रास्ता नई दिल्ली से होकर जाता है, वॉशिंगटन से नहीं। तो कल तक युद्ध रुकवाने का दावा बार बार अमेरिका क्यों कर रहा था?

भारत के प्रधानमंत्री ट्रम्प के इन नजदीकी लोगों के बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे। सफ़ाई भी नहीं दे रहे। ठीक है, कल तक तुम लोगों की निगाह में भारत एक कमजोर देश था, शांत देश था, उसकी इकॉनमी डेड थी, और आज तुम्ही उसे दुनिया का सबसे बड़ा गुंडा बता रहे हो, एक ऐसा युद्ध का सबसे बड़ा खिलाड़ी बता रहे हो जिसको निबटाने में पूरा सो कॉल्ड फर्स्ट वर्ल्ड असफल है। जिस मुद्दे पर अमेरिका में चुनाव हुआ है। बनाओ माहौल, भारत बहुत रुपया खर्चा कर के भी दुनिया में ऐसी चर्चा नहीं पाता खासकर अपने ताक़त की।

यह बात तय है कि अमेरिका भारत के संबंध ख़राब होने से कुछ लाख लोगों के रोजगार पर संकट आने वाला है लेकिन उससे बड़ा सच यह है कि यदि कृषि, डेयरी और मछली उद्योग को अमेरिका के लिए खोल दिया गया तो दसियों करोड़ लोग संकट में फस जायेंगे। भारत अमेरिका के व्यापारिक घाटे से उबरने के लिए तमाम उपाय कर रहा है लेकिन उन उपायों को ज़मीन पर उतारने में समय लगेगा। पर भारत जैसा ऐतिहासिक सांस्कृतिक देश यदि अपने संप्रभुता के क़ीमत पर अपने जीडीपी पर विचार करेगा तो फिर हमें भारत राष्ट्र की जरूरत ही क्या है? और फिर जब आप दुनिया में अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी करके जीने का प्रयास करेंगे तो आपको उसकी एक कीमत चुकानी ही पड़ेगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *