देवेंद्र सिकरवार : प्रतिसंतुलन द्वारा संतुलन ही मोदी सरकार की विदेश नीति का मुख्य आधार .. जन्म से विशुद्ध क्यूट..
इन दिनों चीन व भारत के बीच बड़े आवन जावन हो रहा है और तथाकथित विशेषज्ञ ‘रिक्स’ या ‘ब्रिक्स’ के मजबूत गठबंधन की संभावनाएं जता रहे हैं।
आपको जानकर अच्छा नहीं लगेगा होगा लेकिन सच यह है कि ऐसा शायद ही हो।
प्रतिसंतुलन द्वारा संतुलन ही मोदी सरकार की विदेश नीति का मुख्य आधार है।
इस नीति के मूल में हैं भारत के पास अपरिहार्यता की चाबी का अभाव जो सारे बिग प्लेयर्स के पास है।
–अमेरिका के पास टेक्नोनोलॉजिकल सुपीरियरटी, सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और गोरे नस्लवाद से जुड़े यूरोपीय देशों का समर्थन है।
–रूस के पास विनाशकारी हथियार टेक्नोलॉजी, तेल व गैस और चीन जैसा खरीददार है।
-चीन अकेला है लेकिन उसकी अर्थ व्यवस्था 18 ट्रिलियन की है और उसके पास विश्व की सप्लाई चेन विशेषतः रेयर अर्थ मिनरल व कुछ अन्य तकनीकी हार्डवेयर उत्पादन की चाबी है जिसके बिना अमेरिका, यूरोप का सैन्य, ऑटोमोबाईल व इलेक्ट्रॉनिक उत्पादन ठप हो जायेगा।
-भारत के पास फिलहाल क्या है?
भारत के पास आज की तारीख में हथियार विशेषतः वैमानिकी में पूर्ण आत्मनिर्भरता नहीं है और जनसंख्या के लिहाज से प्रति व्यक्ति उच्च आय वाली पर्याप्त विकसित अर्थव्यवस्था भी नहीं है और यही कारण है कि मोदी क्वाड को एकदम से छोड़ना नहीं चाहते हालाँकि क्वाड का आधार बुरी तरह दरक चुका है।
लेकिन भारत के पास एक ताकत है जो विश्व में किसी के पास नहीं है-
विश्व का सबसे बड़ा ‘मध्यम वर्ग’ का उपभोक्ता बाजार।
लेकिन यह भारत की सबसे बड़ी ताकत के साथ-साथ कमजोरी भी है।
भारत की जनता के संदर्भ में मोदीजी की स्थिति उस बाप की तरह है जिसकी एक बहुत खूबसूरत बेटी और एक अपाहिज बेटी है और वह दोनों से समान प्रेम करता है, विशेषतः कमजोर बेटी से क्योंकि उसे वह अपनी दूसरी बेटी की ही तरह स्वस्थ व सुंदर देखना चाहता है।
लेकिन चारों ओर फैले भेड़िये इस बाप की खूबसूरत बेटी पर जीभ लपलपा रहे हैं और दुःख की बात यह है कि यह बेटी भी बाप के दुःख को समझने को तैयार नहीं और उसे लगता है कि बाप उसके हिस्से के पैसे उसकी बदसूरत व अपाहिज बहन पर खर्च किये जा रहा है।
मध्यम वर्ग वही खूबसूरत लड़की है और भारत के किसान, पशुपालक, मजदूर व आर्थिक रुप से कमजोर वर्ग आदि कुल 40% जनसंख्या उसकी अपाहिज बेटी है।
अमेरिका चाहता है कि मोदी अपनी इस खूबसूरत बेटी को उसे ब्याह दे यानि अपने दरवाजे कृषि व डेयरी उत्पादों के लिए खोल दे।
चीन की भी यह गंदी ख्वाहिश सस्ते व विषैले इलेक्ट्रोनिक सामानों के संदर्भ में तो है ही, साथ ही वह ताइवान और तिब्बत की नस से भारत का हाथ हटवाना चाहता है।
अब मोदी जी के सामने इधर कुआँ और उधर खाई है।
पर यह सारी स्थिति तो ट्रम्प के प्रथम कार्यकाल में भी थीं पर तब ऐसा क्यों नहीं हुआ?
ब्रह्मा चेलानी जैसे विशेषज्ञ जब यह कहते हैं कि मोदी को ट्रम्प के ईगो को संतुष्ट करना चाहिए जैसे कि कल यूरोपीय नेताओं ने किया तो मुझे हंसी आती है कि भारत की एक समस्या ऐसे विशेषज्ञ भी हैं।
यह सही है कि मोदी जी ने जो बिडेन के काल में ट्रम्प से मिलने से इनकार कर भीषण गलती की थी परन्तु उसके बदले ट्रम्प व्हाइट हाउस में मोदी जी का स्वागत एक सचिव से करवाकर अपना बदला पूरा कर चुके हैं लेकिन उसके बाद जो कुछ हो रहा है उसमें व्यक्तिगत एंगल ढूंढना ज्यादती लगती है हालाँकि नोबेल पुरुस्कार की ट्रम्प की सनक ने सम्भवतः फिर एक मूर्खतापूर्ण व्यक्तिगत एंगल जोड़ दिया है।
लेकिन अगर अमेरिका ‘क्वाड’ की कीमत पर भी यह सब कर रहा है तो मामला ट्रम्प की पहुँच से ऊपर चल रहा है, चाहे वह अमेरिकन डीप स्टेट द्वारा ब्लैकमेलिंग हो या स्वयं ट्रम्प के व्यापारिक साम्राज्य को बढ़ाने देने की शर्त पर समझौता हो।
पर हम इस संभावना को अगर असम्भव मानते हैं तो अमेरिका इस कदर भारत पर झुंझुलाया हुआ क्यों हैं?
उत्तर है, पश्चिमी प्रवृत्ति।
पश्चिम पिछले तीन सौ वर्ष से कभी स्पेन, कभी ब्रिटेन और आज अमेरिका के नेतृत्व में विश्व पर राज कर रहा है।
जब भी विश्व में कोई शक्ति उभरती है, ये भेड़ियों के झुंड की तरह उस पर टूट पड़ते हैं, चाहे वह सोवियत संघ जैसा दानव हो या जापान जैसा बौना या सद्दाम जैसा छोटा मोटा मोहरा।
इन सबके बीच चीन स्वयं को सोवियतों का प्रतिद्वंदी बताते हुए पश्चिम को उल्लू बनाकर अपने कोकून में अपना विकास करता रहा और पश्चिम अपनी जरूरत के कारण चीन को भारत के रीढ़ विहीन कांग्रेसी नेताओं का देश समझकर उसे इग्नोर करता रहा।
लेकिन चालीस साल बाद जब कोकून से तितली की बजाय भयंकर ड्रेगन प्रकट हुआ तो आनन फानन में 2007 में ‘क्वाड’ का गठन हुआ।
यह भले चार देशों का समूह था लेकिन वास्तविकता यह थी कि सैन्य दृष्टि से सारा भार अमेरिका को ही उठाना था और ऑस्ट्रेलिया सप्लाई के लिए चीन पर निर्भर था इसलिए क्वाड कागज पर ही बना रहा।
लेकिन 2014 में मोदी सरकार के आने के साथ स्थिति में तेजी से परिवर्तन हुआ। भारत न केवल तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था बना बल्कि सैन्य रुप से भी बेहद शक्तिशाली बना इसलिए 2017 में वर्ल्ड ऑर्डर की पटकथा पुनः लिखते हुए क्वाड को सक्रिय किया गया।
2020 में कोविड के कारण प्रॉडक्शन सेंटर चीन से भारत की ओर शिफ्ट हुआ तो ऑस्ट्रेलिया की झिझक भी मिटी और क्वाड एक वास्तविक संगठन में बदला।
अमेरिकी थिंक टैंक की नीयत भारत को चीन के विरुद्ध उसी तरह इस्तेमाल करने की थी जैसे कार्नवालिस ने टीपू के विरुद्ध मराठों को इस्तेमाल किया था जिसमें सारे नुक्सान मराठो के हिस्से आये और लाभ अंग्रेजों के।
लेकिन अमेरिकी थिंक टैंक का एक वर्ग शुरू से ही मोदी की ‘इंडिया फर्स्ट’ नीति को लेकर आशंकित था जिसकी अभिव्यक्ति न्यूयॉर्क टाइम्स में उस अभिलेख में हुई जिसमें मोदी पर अमेरिका व पश्चिम को भारत के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया।
इसीलिये अमेरिकी डीप स्टेट ने चीन पर निगाह रखने के नाम पर बांग्लादेश से सैन्य अड्डे के लिए टापू की मांग की ताकि भारत पर नजर व नियंत्रण रखा जा सके।
लेकिन भारत की बहुत ज्यादा तेजी से बढ़ती आर्थिक शक्ति और ऑपरेशन सिंदूर में सैन्य शक्ति के अकल्पनीय प्रदर्शन ने अमेरिका को अपनी रणनीति बदलने पर विवश कर दिया है।
उन्हें स्पष्ट तौर पर यह लगने लगा है कि कहीं ऐसा न हो कि चीन को बर्बाद करने की कोशिश में भारत इतना शक्तिशाली हो जाये कि पश्चिम के लिए सैन्य चुनौती बन जाये जबकि विश्व में इस्कॉन के माध्यम से ‘सांस्कृतिक चुनौती’ पहले ही बना हुआ है।
अस्तु! यह निर्विवाद सत्य है कि कुछ मिलिट्री तकनीक व तेल को छोड़ दें तो चीन विश्व शक्ति संतुलन में रूस से ऊपर है लेकिन वह अमेरिका व यूरोप की ‘भेड़ियों के झुंड’ के रुप में में ‘शिकार’ करने की वृत्ति से पहले ऐतिहासिक अनुभव से परिचित हैं और आशंकित भी।
लेकिन केवल यही कारण नहीं है जो चीन भी भारत से बड़ी गर्मजोशी से मिल रहा है।
वास्तव में इसके पीछे वही पुष्ट-अपुष्ट घटना है जो ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हुई और वह थी पाकिस्तान में अमेरिकी न्यूक्लियर मिसाइल अड्डे का खुलासा।
चीन को पाकिस्तान का ‘वेश्या चरित्र’ एकदम स्पष्ट हो गया और जिस तरह आसिम मुनीर ट्रम्प की गोदी में बैठ गया है, उससे स्पष्ट है कि पाकिस्तानी एकदम अविश्वसनीय चरित्र का देश है लेकिन वहां उसका अरबों का निवेश सी पैक में फंसा पड़ा है अतः वह पाकिस्तान को छोड़ भी नहीं सकता।
लेकिन भारत से ऐतिहासिक सीमा विवाद और तिब्बत की फांस के चलते भारत से दीर्घकालीन संबंध भी संभव नहीं है
इसीलिये चीन का विदेश मंत्री भारत दौरे के बाद सीधे पाकिस्तान दौड़ा, सफाई देने के लिए।
इसी तरह मोदी जी भी शंघाई सम्मिट में जाने से पूर्व जापान पहुंचे हैं ताकि चीन के भविष्य के के खतरे को न्यूट्रलाइज करने के लिए एक मोहरा बना रहे।
अमेरिका भी भली भांति जानता है कि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद कभी नहीं सुलझेगा और उसके रहते कभी भी दोनों देश एक दूसरे पर भरोसा नहीं कर सकते और इसी लिए अमेरिकी वित्त सचिव भारत पर दिनोंदिन मौखिक हमले करने की जुर्रत कर रहा है।
यह भी कड़वा सत्य है कि अमेरिका जानता है कि भारत के पास बेचने को जो कुछ है उसका बाजार या तो अमेरिका है या यूरोप और यूरोप अमेरिका के इशारों पर नाचता है जैसा कि पिछले दिनों हमने देखा जब ट्रम्प प्रिंसिपल की तरह बैठकर व्हाइट हाउस में युरोपियन नेताओं की क्लास ले रहे थे। चीन स्वयं उत्पादक है, जापान में उपभोग सीमित है और रूस को जरूरत नहीं और इसीलिये भारत को नुक्सान उठाना ही होगा जो राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए कोई मायने नहीं रखता।
इसके उपरान्त भी एक बात तो तय है कि जब अमेरिका भारत पर 1965, 1974, 1998 में प्रतिबन्ध लगाकर कुछ बिगाड़ नहीं पाया तो 50 प्रतिशत टेरिफ से हुए थोड़े आर्थिक नुक्सान से क्या ही बिगड़ेगा।
लेकिन अमेरिका को असली डर है ब्रिक्स करेंसी से।
ब्रिक्स में स्वयं भारत ब्रिक्स करेंसी नहीं चाहता क्योंकि यह वस्तुतः चीनी यूआन को अधिक फायदा पहुंचायेगा इसलिए भारत स्वयं रूपये विनिमय मुद्रा के रूप में मजबूत करने के प्रयासों में जुटा है।
इसके अलावा अमेरिका को इंडो पेसफिक में भारत के नौसैनिक सैन्य महत्व का भी पता है। इसीलिये अमेरिका ने जापान और ऑस्ट्रेलिया से स्पष्ट पूछा है कि जब ताईवान को लेकर उसका चीन से युद्ध होगा तो वह उसका साथ देंगे या नहीं।
इसलिए भारत के लिए विश्व में अजीब स्थिति बनी हुई है।
रूस vs अमेरिका + यूरोप
चीन vs अमेरिका + यूरोप
चीन vs जापान + अमेरिका
भारत vs चीन + पाकिस्तान
इजरायल + अमेरिका vs मुस्लिम देश
भारत vs पाकिस्तान + कभी अमेरिका कभी चीन
अब विश्व में भारत के मात्र दो प्राकृतिक सहयोगी हैं- इजरायल और जापान लेकिन वहां भी द्वैत है इसलिए खुलकर किसी एक का पक्ष नहीं ले सकते।
भारत का मूल उद्देश्य है पाकिस्तान का विखंडन और गिलगित बाल्टिस्तान को हासिल करना और तब जाकर वह पश्चिम दिशा से फ्री हैंड होकर मनचाही विदेश नीति चला सकता है और तब उसे,
रूस और अमेरिका,
चीन और जापान,
इजरायल और मुस्लिम देश,
इनके बीच संतुलन साधकर ही चलना होगा।
विदेश नीति में राष्ट्रीय स्वार्थ महत्वपूर्ण होते हैं निजी सम्मान और भावनाएं नहीं।
-बीते कल मोदी के गले मिलते ट्रम्प का फोन तक आज मोदी नहीं उठाते और कल को फिर हो सकता है मोदी ही ट्रम्प को शांति का मसीहा घोषित कर दें बशर्ते भारत के राष्ट्रीय हित पूरे हो रहे हों।
-आज चीन के रैड कारपेट पर चीन के स्वागत को स्वीकार करते मोदी कल को अंडमान की नौसैनिक कमांड को चीन की सप्लाई लाइन को ब्लॉक करने का आदेश भी जारी कर सकते हैं।
-आज पुतिन से गले लगते मोदी कल को तेल खरीद बंद करके अमेरिकी F 35 खरीदने का समझौता कर सकते हैं।
-ईरान ओ अरब से गले मिलते मोदी इजरायल को हमास पर बरसाने के लिए गोला बारूद सप्लाई कर सकते हैं।
अब भारत के कुछ सयाने, राष्ट्रीय हित साधने की नीति पर व्यंग्य करें, आहत हों, क्रुद्ध हों तो क्षमा कीजिये आप आज नहीं बल्कि जन्म से विशुद्ध क्यूट हैं।
