प्रसिद्ध पातकी : वराह अवतार

आधुनिक विज्ञान में एक अवधारणा यह है कि मानव सहित इस सृष्टि की उत्पत्ति समुद्र से हुई है। वैसे तो मानव शरीर में बहने वाले रक्त और समुद्र जल में रासायनिक तौर पर कोई बहुत समानताएं नहीं हैं किंतु सोडियम और क्लोरीन ऐसे तत्व हैं जो दोनों में पाये जाते हैं यद्यपि दोनों के अनुपात में जमीन-आसमान जैसा अंतर है।

प्रख्यात वेद विज्ञान ममर्ज्ञ मधुसूदन ओझा जी के विद्वान शिष्य मोतीलाल शर्मा जी के अनुसार वेदों में तमाम तरह के प्राणों का वर्णन है, यथा वशिष्ट प्राण, अगस्त्य प्राण आदि। इसी प्रकार वराह प्राण हैं। हमारे शास्त्रों में आता है कि विष्णु भगवान के तीसरे अवतार भगवान वराह ने पृथ्वी का उद्धार किया था।
अब वेदों में जो यह वराह प्राण का वर्णन है, यह एक बड़ा महत्वपूर्ण कार्य करता है। समुद्र जल की लहरों में जो पानी उछलता है, उसके कणों में इसी वराह प्राण के कारण वायु उलझ कर झाग बनता है। यही झाग सूख कर रेत कण बनाते हैं। बस यही रेत कण पृथ्वी के उत्पत्ति का मूल हैं। ऐसा वेद के कुछ मनीषियों का मानना है।

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भगवान विष्णु के दशावतारों में प्रथम दो अवतार..मत्स्य एवं कूर्म तो पूर्णत: जल में रहने वाले हैं। किंतु तीसरे अवतार का संबंध जल एवं थल दोनों से है। मेरा मानना है कि ऐसी भूमि प्राय: दलदली भूमि होगी। सृष्टि के विकास के क्रम में दलदली भूमि में मनुष्य ने अपने कामों के लिए वराह प्राणी को उपयोगी पाया होगा।
कश्मीर में एक स्थान है बारामूला। आजकल वहां की स्थानीय आबादी ने इसे ‘बारामुल्ला’ कहना शुरू कर दिया है। नाम को अपने मजहब के अनुरूप बदलने का एक भौंड़ा प्रयास। इस स्थान का वास्तविक नाम वराहमूल है। ऐसा संभव है कि वराहमूल पहले दलदली भूमि हो।
वैसे उत्तर प्रदेश के वर्तमान कासगंज जिले के सोरों को ‘शूकर क्षेत्र’ कहते हैं। कोई बड़ी बात नहीं कि यह क्षेत्र कभी दलदली भूमि हो। मनुष्य ने विकास क्रम में दलदली भूमि को शुष्क भूमि में परिवर्तित करने की सीख शायद शूकर प्राणी से ली हो।

खैर, भारतीय शास्त्रों के प्रतीक बहुत दुरूह और अलग अलग बिखरे हुए हैं। इनकी कड़ियों को आपस में जोड़ना काफी चिंतन मांगता है। अब बात ज्योतिष की करते हैं। ज्योतिष में नौ ग्रहों को भगवान के नौ अवतारों का प्रतिनिधि माना गया है। यथा सूर्य राम, चंद्रमा कृष्ण, मंगल नरसिंह, बुध बुद्ध, बृहस्पति वामन, शुक्र परशुराम, शनि कूर्म, राहु वराह एवं केतु मीन।

अब जरा राहु पर विचार करें तो राहु ग्रह रूपांतरण की कला में माहिर है। पौराणिक आख्यान है कि किस प्रकार राहु ने भेष बदलकर देवताओं की पंक्ति में स्थान बनाया और अमृत पान किया। अब जरा रुककर विचार करिए तो दलदली भूमि को रूपांतरित कर शुष्क भूमि बनाने के प्रयास क्या वराह अवतार के काल में संभव नहीं हैं।

वराह भगवान से जुड़े एक एक अन्य विषय को समझते हैं। वैष्णव जन भगवान के कुछ स्वरूपों यथा नरसिंह, वराह, वामन और वटपत्र शायी मुकुंद के को उग्र स्वरूप मानते हैं। ज्योतिष में राहु को मलेच्छ वर्ग का प्रतिनिधि भी माना जाता है। यह जो भगवान वराह हैं, वे मलेच्छ तंत्र का उच्छेदन करने में बहुत शक्तिशाली देव हैं। यह बात कोई सुनी-सुनायी या किताबी बात नहीं हैं। यह मेरे अनुभव से जुड़ी बात है। इस लिए यदि कोई ऐसा मामला हो तो संबंधित व्यक्ति के घर में भगवान वराह की तस्वीर लगवाने में तनिक भी विलंब नहीं किया जाना चाहिए।

विष्णु पुराण में भगवान वराह द्वारा पृथ्वी उद्धार के उपरात ऋषि-मुनियों ने उनकी बहुत सुन्दर स्तुति की है। उसमें एक श्लोक आता है :-

द्यावापृथिव्योरतुलप्रभाव यदन्तरं तद्वपुषा तवैव
व्याप्तं जगद्व्याप्तिसमर्थदीप्ते हिताय विश्वस्य विभो भव त्वम्।।

(हे अतुलीनय प्रभाव वाले प्रभु, पृथ्वी और द्युलोक के बीच में जो अन्तराल है, वह आपके शरीर से व्याप्त हो गया है, विश्व को व्याप्त करने में समर्थ दीप्ति (तेज) से युक्त हे प्रभो, आप समस्त विश्व का कल्याण करें)

वराह जयंती की राम राम।।

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