डॉ. भूपेंद्र सिंग : PM मोदी आराम से फाइव स्टार क्यों खा रहें..! गैंग ऑफ़ वासेपुर “मुंह लगाओगे तो बड़ा हो जाएगा”

टीवी पर फाइव स्टार चॉकलेट का ऐड आया था जिसका थीम था “कभी कुछ ना करके भी देखो”। एक बुजुर्ग महिला सड़क के किनारे खड़ी रहती हैं, उनकी छड़ी गिर जाती है। वह बगल के खड़े लड़के से कहती हैं कि बेटा उसे उठा दो लेकिन फाइव स्टार खाने में बिजी वह लड़का उस बुज़ुर्ग की बात का कोई ध्यान नहीं देता। मजबूरी में वह बुजुर्ग महिला अपनी छड़ी उठाने आगे बढ़ती हैं और तभी ऊपर से मकान का एक हिस्सा गिर जाता है जहाँ वह पहले खड़ी थीं। वह समझ जाती हैं कि यदि उस लड़के ने छड़ी उठाई होती और वह वहीं खड़ी रह जातीं तो मृत्यु निश्चित थी। वह थैंक यू बेटा कह के आगे बढ़ जाती हैं।

जब से विपक्षी दलों को को यह एहसास हो गया है कि वह लंबे समय तक सत्ता से दूर रहने वाली हैं, वे किसी न किसी बहाने देश में हिंसा कराने का उपाय खोजती रहती है। पहले CAA के बहाने लोगों को सड़क पर उतारा और महीनों महीनों दिल्ली और अगल बगल के इलाकों को बंद करके रखा। इनको आशा थी कि आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों मोदी सरकार इन धरनाबाजों के ख़िलाफ़ कुछ तो करेगी ही, लेकिन सरकार फाइव स्टार खाती रही, इधर ये धरना दिए जा रहे हैं, दिए जा रहे हैं, टीवी रिपोर्टर, डफली बजाने वाले कामरेड आंदोलन की धुन पर नाचे जा रहे हैं, लेकिन सरकार कुछ नहीं कर रही। धीरे धीरे ये थकने लगे, लेकिन धरना जारी रहा, कभी बिरियानी के लालच में तो कभी दिहाड़ी के लालच में।

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धीरे धीरे इनको फण्ड करने वाले भी एक्जास्ट हो रहे थे और पैसे भेजने वाले भी कार्रवाई के भय से मुक्त होकर लापरवाह हो रहे थे। अंत में कोरोना आ गया और लंबे आंदोलन से थके आंदोलनजीवी मौक़ा खोज रहे थे और सरकार ने बिना लाठी मारे, बिना गोली चलाये, आराम से इनके फंडिंग करने वालों को खोजकर आंदोलन वहीं पहुँचा दिया जहाँ से शुरू हुआ था। इस आंदोलन से दिल्ली एक बड़े हिस्से में जितना जाम लगने से आर्थिक क्षति हुई होगी, उससे ज़्यादा विदेशी फंडिंग भारत के अर्थ व्यवस्था में आ गई।

इसी तरह फ्रॉड किसान आंदोलन खड़ा किया गया। जिस कृषि क़ानूनों की माँग जीवन भर महेंद्र सिंह टिकैत करते रहे, वहीं क़ानून मोदी सरकार लेकर आई थी यानी हमारा खेत, हमारी लागत, बीच में आढ़तिये कौन? खैर खालिस्तानियों और हरियाणा में असफल जाट आंदोलन करने वाले  गैंग को इसमें मौका दिखाई दिया। लगे दुष्प्रचार करने, लोगों को जगह जगह दिल्ली बॉर्डर पर खड़ा कर दिया, हफ़्ते महीनों में और महीने साल में बदल गए, आंदोलन चलता रहा। विदेशी फंडिंग आ रही है, दारू चखना पिज़्ज़ा पवाया जा रहा है। ट्रेक्टर पर डीजे लगाकर मर जा, मर जा मोदी के नारे लगवाये जा रहे हैं। कभी किसी महिला के साथ दुष्कर्म का समाचार आ रहा है तो कभी किसी दलित सिक्ख को जिंदा काट दिया जा रहा है। कभी दिल्ली में लाल किले पर चढ़ाई हो रही है तो कभी पुलिस वालो को खाई में धकेला जा रहा है। लेकिन सरकार फाइव स्टार खाने में लगी रही। धीरे धीरे लोग थकने लगे लेकिन लाठी नहीं चली। विदेश से फण्ड कैसे आ रहा है सब पता चल गया। हरियाणा में अपने आप बाक़ी सारा समाज एक समाज द्वारा किए गए इस घटनाक्रम को गुंडई के रूप में स्वीकार किया और भाजपा की सत्ता में फिर से वापसी करा दी। आंदोलन अपनी मौत मर गया।

ख़ालिस्तानी, अमेरिका के मदद से कनाडा से फंडिंग उठाते रहे, कभी कनाडा में बवाल करते तो कभी पंजाब में। कभी कनाडा में मंदिर पर हमला करते तो कभी पंजाब में। किसी दिन बेअदबी के नाम पर किसी मानसिक रोगी को मार डालते तो कभी किसी की हत्या कर देते। यहाँ तक बढ़ी कि प्रधानमंत्री के काफिले को घेर लिया, उनको मारने वाले वीडियोगेम और म्यूजिक वीडियो लांच किया, लेकिन केंद्र सरकार ने कोई अतिरंजित कार्रवाई नहीं की। मोदी सरकार आराम से फाइव स्टार खाने में व्यस्त रही। इसलिए खालिस्तानियों के आका खासकर पाकिस्तान के चौड़े होकर घूमने लगे और सुनने को मिलता रहा कि अज्ञात हमलावर निबटाते रहे। बहुत समय बाद खालिस्तान आंदोलन बिना दस बीस हज़ार लोगों की जान लिए अपने चरमोत्कर्ष से स्खलित हुआ है।

दरअसल कोई भी आंदोलन जो लंबे समय तक किया जाता है उसका उद्देश्य नेता अथवा पार्टी खड़ा करना होता है। लेकिन नेता अथवा पार्टी पैदा होने के लिए यह आवश्यक है कि सरकार इन आंदोलनों का हिंसा के बल पर दमन कर दे। बिना सरकार द्वारा हिंसा किए किसी भी आन्दोलन से नेता अथवा पार्टी पैदा नहीं हो सकती। कोई भी आंदोलन एक नेता अथवा पार्टी को जन्म देने को आतुर एक गर्म मादा जैसी होती हैं जो सत्ताधारी नेता रूप नर को बार बार हिंसा रूपी संभोग को आमंत्रित करती है। यदि आंदोलन के साथ सत्ताधारी नेता ने हिंसा रूपी संभोग कर लिया तो नेता अथवा पार्टी का जन्म हो जाएगा। मोदी जी जैसे अति धैर्यवान, जितेंद्रिय व्यक्ति को ये लोग उकसाना चाहते हैं लेकिन काम नहीं बन रहा। वह तो आराम से फाइव स्टार खा रहे हैं। न CAA आंदोलन से कोई नेता बना, न खालिस्तान आंदोलन से, न किसान आंदोलन से।

अब विपक्ष एंड कंपनी इसी तरह का आंदोलन मतदाता सूची में हो रहे सुधारों के नाम पर खड़ा कर रहा है। उसे पता ही नहीं है कि वह कितने घाघ व्यक्ति के सामने खड़ा है। विपक्ष को लगता है कि वह लोगों को उकसा कर सड़क पर ले आयेगा और वो लोग बांग्लादेश की तरह बिना चुनाव के सत्ता बदल देंगे। इनको अभी तक यह समझ नहीं आया कि यदि बांग्लादेश में भी शेख हसीना उस आंदोलन के दौरान फाइव स्टार खाती रहतीं तो उनकी सत्ता को भी खतरा उत्पन्न नहीं होता। उन्होंने फाइव स्टार छोड़कर आंदोलन को जबाब देने का निर्णय लिया। अचानक जो लड़के छोटे छोटे छात्र नेता थे, वह शेख़ हसीना के बराबर के नेता बन गए और शेख़ हसीना को सत्ता ही नहीं देश भी छोड़ना पड़ा। उस समय दक्षिणपंथ के कुछ बेवक़ूफ़ भी मोदी जी को शेख हसीना से सीखने की सलाह दे रहे थे और सलाह देने वाले ऐसे की जिस समय में मोदी जी भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव हो गए थे उस समय ये सब पैदा भी न हुए थे। राजनीति में “कुछ न करना” भी बहुत कुछ करना होता है और “कुछ न बोलना” भी बहुत कुछ बोलना होता है।

विपक्षी दल गैंग रोज़ रोज़ सड़क पर नौटंकी करता रहे लेकिन मुझे दूर दूर तक यह आशा दिखाई नही पड़ती कि मोदी सरकार इस पर कोई प्रतिक्रिया भी देगी क्यूँकि यहीं सबसे अच्छी प्रतिक्रिया होगी। गैंग ऑफ़ वासेपुर में रामाधीर सिंह ने कहा था कि छोटा आदमी है, गुंडई करना चाहता है, करने दो। स्पष्ट मतलब है कि मुंह लगाओगे तो बड़ा हो जाएगा।

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