अमित सिंघल : मोदी की जमीनी राजनीति और विरोध आंदोलनों की सीमाएँ
राहुल-अखिलेश-लालू पुत्र इत्यादि भारत में पश्चिमी राजनीतिक अनुभवों को थोपने प्रयास करते हैं, जबकि प्रधानमंत्री मोदी एवं उनकी टीम भारतीय संस्कृति एवं मिटटी से जुड़ी कैम्पेनिंग करती है।
कुछ सप्ताह पूर्व प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति महोदया के साथ ओड़िसा में मयूरभंज जिले के पहाड़पुर गाँव गए थे। वीडियो में देखा जा सकता है कि मोदी जी गाँव के निवासियों से मिले, उनके बच्चो से बात की, वहां के संथाली वनवासियों के मंदिर (जो एक पवित्र उपवन था) में पूजा की, एवं Rs 47,600 करोड़ की विकास योजनाओ की घोषणा की।
क्या आपको लगता है कि मयूरभंज में काक्रोचों का कोई प्रभाव होगा? लेकिन फिर भी वहां से कुछ सांसद एवं विधायक चुने जाते है।
ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जब प्रति माह – प्रति माह, ना कि वर्ष में एक बार – मोदी जी एवं उनकी टीम सुदूर स्थित गाँव जाते है और प्रत्यक्ष जनसंवाद करते है, सरकार की नीतियों के बारे में बतलाते है; उनके निवासियों को सम्मानित करते है, वहां स्थित मंदिरो में पूजा करते है।
अब भारत जैसे विविधता से भरे 140 करोड़ जनसँख्या वाले विशाल देश में सदैव कुछ लोग रुष्ट मिलेंगे, किसी ना किसी बात पर विरोध प्रदर्शन के लिए तैयार मिलेंगे। ऐसे लोगो को लगता है कि बस, कुछ हज़ार या इवेन लाख लोगो के हिंसक प्रदर्शन की आवश्यकता है और सरकार गिर जायेगी।
भारत के सन्दर्भ में यह संभव नहीं है। जो लोग कजरी या अन्ना का उदहारण देते है, वे भूल जाते है कि तात्कालिक सरकार तब भी चुनावी प्रक्रिया के द्वारा हटाई गयी थी, ना कि शीला दीक्षित या फिर सोनिया ने रिज़ाइन कर दिया था। वी पी सिंह, देवे गौड़ा या फिर गुजराल भी टिके रहते, लेकिन उन्हें अंदुरुनी चुनौती अपने ही सहयोगियों से मिल रही थी।
एक छोटे से नेपाल या बांग्लादेश में हिंसक प्रदर्शनों से सत्ता परिवर्तन नहीं होता, अगर वहां की तात्कालिक सरकार ने एक हिंसा से निपटने के लिए सरकारी हिंसा का सहारा लिया ना होता। इन दोनों देशो में दर्ज़नो-सैकड़ो प्रदर्शनकारी मारे गए थे। यही स्थिति हाल के वर्षो में अल्जीरिया, सूडान, लेबनान, मिश्र, यमन, इराक, अर्मेनिआ, बोलीविया, यूक्रेन, साउथ कोरिया इत्यादि राष्ट्रों में देखने को मिली थी।
अतः अर्बन नक्सल एवं काक्रोच को लगता है कि एक विशाल हिंसक प्रदर्शन कर दे तो सरकार गिर जायेगी। लेकिन उनकी हिंसा तभी सफल होगी जब सरकार स्वयं हिंसा का प्रयोग करे। ऐसी हिंसा जिसमे कुछ प्रदर्शनकारी मारे जाए। तभी राजदीप ने फर्जी किसानो द्वारा लाल किले पर दंगे के समय एक प्रदर्शनकारी के मरने की फर्जी समाचार चलाया था।
लेकिन सरकार उन्हें धरने पर बैठने देती है। इन प्रदर्शनकारियों को चलाने वाले, उकसाने वाले, भोजन करवाने वाले शीघ्र ही अपनी बेवकूफी से अपना हिन्दू विरोधी एवं जेहादी समर्थक एजेंडा उजागर कर देते है। इस बार भी प्रभु श्री राम, उनके मंदिर पर भड़काऊ एवं छिछोरे बयान दिए गए, केवल एक संप्रदाय के भगवान् का नाम रहने का नारा दिया गया, 370 वापस लाने का वादा किया गया, नक्सलियों को रिहा करने की मांग की गयी, उमर खालिद (जो दिल्ली दंगे का आरोपी है) के पक्ष में नारेबाजी की गयी एवं अत्यधिक लोकप्रिय प्रधानमंत्री एवं गृह मंत्री की मृत्यु की कामना की गयी।
अब होता यह है कि ऐसे सभी आंदोलन बहुसंख्यक समाज में अप्रभावी और बदनाम हो जाते है। फर्जी किसान आंदोलन को भी निपटा दिया गया होता, लेकिन तब दिल्ली की कजरी सरकार से उसे हवा दी जा रही थी और यूपी में एक वर्ष में चुनाव की घोषणा होने वाली थी।
एक तरह से अगर वृहद समाज किसी ना किसी बात को लेकर सरकार से क्रोधित या असंतुष्ट रहता है, तो ऐसे आंदोलन से उनका गुबार निकल जाता है। कॉक्रोचों एवं अर्बन नक्सल के ऐसे आंदोलन एक लोकप्रिय सरकार के लिए सेफ्टी वाल्व का काम करते है।
एक तरह से ऐसे नक्सल तत्व सरकार के लिए एक useful idiot या उपयोगी मूर्ख की तरह होते है। एक ऐसा व्यक्ति जिसे सब मूर्ख मानते है, लेकिन मूर्ख व्यक्ति भी कुछ कार्यो के लिए उपयुक्त रहता है।


