योगी अनुराग : लौकिक संस्कृत साहित्य में सूर्यदेव

लौकिक संस्कृत साहित्य की सुदीर्घ एवं वैविध्यपूर्ण परम्परा में भगवान् सूर्य का स्वरूप अत्यन्त दीप्तिमान, महिमामण्डित एवं बहुआयामी रहा है। यद्यपि रामायण, महाभारत तथा पुराणों एवं उपपुराणों में सूर्यदेव के देवत्व, उनके पौराणिक आख्यानों एवं वंशानुगत महत्त्व का विस्तृत एवं विशद वर्णन प्राप्त होता है, तथापि लौकिक काव्यों, नाटकों, चम्पूकाव्यों एवं स्तोत्र साहित्यों में उनकी उपस्थिति कलात्मक, सौन्दर्यशास्त्रीय एवं दार्शनिक धरातल पर अधिक प्रखर एवं प्रभावोत्पादक है। ऋग्वेद के सविता एवं हिरण्यगर्भ से विकसित होकर लौकिक साहित्य के आदित्य, भास्कर एवं दिवाकर तक की यह सुदीर्घ यात्रा मानवीकरण, प्रकृति-चित्रण एवं आध्यात्मिक चेतना के अद्भुत एवं अनुपम समन्वय को प्रदर्शित करती है।

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संस्कृत के मूर्धन्य महाकवियों ने सूर्य को केवल एक खगोलीय पिण्ड, भौतिक प्रकाश का पुञ्ज अथवा पौराणिक देवता के रूप में ही स्वीकार नहीं किया है, अपितु उन्हें चराचर जगत् की आत्मा, ऊर्जा के शाश्वत स्रोत एवं समस्त जीवन की गतिशीलता के आधार के रूप में प्रतिष्ठित किया है। ईसवीय संवत् के प्रारम्भिक शताब्दियों से लेकर मध्यकाल की अन्तिम सीमाओं तक के कवियों ने अपनी कालजयी कृतियों में सूर्य के उदय, मध्याह्न की प्रचण्डता एवं अस्ताचलगामी सन्ध्या की स्वर्णिम प्रभा का जो सूक्ष्म एवं अलङ्कारिक वर्णन किया है, वह संस्कृत साहित्य की परिष्कृत सौन्दर्यशास्त्रीय चेतना एवं गम्भीर जीवन-दर्शन का परिचायक है। सूर्य की रश्मियाँ केवल बाह्य अन्धकार का निवारण नहीं करतीं, अपितु वे अज्ञान के सघन तिमिर को हरने वाली ज्ञान की दिव्य पुञ्ज भी हैं, जो मानव हृदय को आलोकित करती हैं। विशिष्ट साहित्यिक कृतियों एवं कवियों ने महाकाव्यों एवं पुराणों की पारम्परिक परिधि से पृथक् होकर सूर्यदेव के स्वरूप को नवीन अर्थवत्ता, मौलिक उपमान एवं दार्शनिक गम्भीरता प्रदान की है। सूर्य का यह साहित्यिक स्वरूप भारतीय मनीषा के चिन्तन, सृजन एवं प्रकृति के साथ उसके तादात्म्य का उत्कृष्ट एवं जीवन्त प्रतिफल है, जो सहस्राब्दियों से भारतीय संस्कृति को आलोकित कर रहा है।

महाकवि कालिदास की कालजयी रचनाओं में सूर्य का चित्रण राजसी गरिमा, प्राकृतिक सुषमा एवं मानवीय संवेदनाओं के अद्भुत सामञ्जस्य के साथ हुआ है। उनके सुप्रसिद्ध महाकाव्य रघुवंशम् में सूर्यवंश के प्रतापी राजाओं के चरित्र चित्रण के माध्यम से सूर्य के तेज, न्यायप्रियता एवं लोक-कल्याणकारी स्वरूप को रेखांकित किया गया है। कालिदास ने सूर्य को ‘जगच्चक्षु’ अर्थात् संसार की आँख कहकर सम्बोधित किया है, जो सम्पूर्ण विश्व के शुभ-अशुभ कर्मों का निरन्तर साक्षी है। कुमारसम्भवम् के अष्टम सर्ग में सन्ध्याकालीन अस्ताचलगामी सूर्य का वर्णन करते हुए कवि ने उसे एक विरही प्रेमी के रूप में कल्पित किया है, जो अपनी रश्मियों रूपी करों से कमलिनी का कोमल स्पर्श करता है। कालिदास की दृष्टि में सूर्य केवल प्रकाश का भौतिक स्रोत नहीं, अपितु समय का परम नियामक एवं धर्म का रक्षक है। उनके नाटकों, विशेषतः अभिज्ञानशाकुन्तलम् एवं विक्रमोर्वशीयम् में भी सूर्य की स्तुति एवं उनके तेज के माध्यम से मङ्गल कामना की गई है, जो तत्कालीन समाज में सौर उपासना की व्यापकता एवं महत्ता को सिद्ध करती है। कालिदास का सूर्य-वर्णन उनकी सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति एवं प्रकृति के साथ तादात्म्य का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है। उन्होंने सूर्य के उदय को नवजीवन के सन्देशवाहक के रूप में प्रस्तुत किया है, जो समस्त जड़-चेतन जगत् को निद्रा से जगाकर क्रियाशील बनाता है। सूर्य की किरणों का पृथ्वी के साथ जो सम्बन्ध कालिदास ने दर्शाया है, वह वात्सल्य, प्रेम एवं सृजन की पराकाष्ठा है, जो पाठक के हृदय में सात्त्विक भावों का सञ्चार करती है।

लौकिक संस्कृत साहित्य में सूर्य विषयक स्तोत्र परम्परा का चरमोत्कर्ष महाकवि मयूरभट्ट कृत सूर्यशतकम् में स्पष्टतः दृष्टिगोचर होता है। यह ग्रन्थ 100 श्लोकों का एक ऐसा काव्यमयी पुञ्ज है, जिसमें सूर्य के रथ, उनके सप्त अश्वों, सारथि अरुण एवं उनकी सहस्र किरणों का अत्यन्त सूक्ष्म, अलङ्कारिक एवं ओजपूर्ण वर्णन प्राप्त होता है। जनश्रुति एवं साहित्यिक साक्ष्यों के अनुसार मयूरभट्ट ने असाध्य कुष्ठ रोग से मुक्ति प्राप्त करने हेतु इस स्तोत्र की रचना की थी, जो सूर्य की आरोग्यप्रदायक एवं जीवनदायिनी शक्ति का जीवन्त प्रमाण माना जाता है। इस विशिष्ट कृति में स्रग्धरा छन्द का प्रयोग किया गया है, जो इसकी ध्वन्यात्मक गम्भीरता एवं लयात्मक प्रवाह को द्विगुणित कर देता है। मयूरभट्ट ने सूर्य की किरणों को ‘भास्वती’ कहकर उनकी वन्दना की है, जो न केवल भौतिक अन्धकार का विनाश करती हैं, अपितु साधक के समस्त पापों एवं व्याधियों का समूल उच्छेदन करने में समर्थ हैं। यह ग्रन्थ न केवल धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से अपितु काव्यशास्त्रीय एवं अलङ्कारशास्त्रीय दृष्टि से भी एक उत्कृष्ट रचना है, जिसने परवर्ती अनेक कवियों को सूर्य-वर्णन हेतु नवीन उपमान एवं अप्रस्तुत विधान प्रदान किए। मयूरभट्ट की लेखनी में सूर्य का तेज साक्षात् परब्रह्म के रूप में अवतरित हुआ है, जो सृष्टि के प्रत्येक अणु को अपनी दीप्ति से आलोकित करता है। उनकी कल्पना में सूर्य का रथ सात अश्वों द्वारा वाहित होकर गगन मण्डल में जो अपूर्व शोभा उत्पन्न करता है, वह संस्कृत साहित्य की अनमोल निधि है, जो भक्त और कवि के हृदय के मिलन को प्रदर्शित करती है।

मयूरभट्ट के समकालीन एवं सम्राट हर्षवर्धन के सभाकवि बाणभट्ट ने अपने सुप्रसिद्ध गद्यकाव्य हर्षचरितम् में सूर्योपासना के राजकीय एवं सांस्कृतिक स्वरूप को अत्यन्त प्रभावशाली ढङ्ग से प्रस्तुत किया है। इस ऐतिहासिक रचना में राजा प्रभाकरवर्धन की अनन्य एवं निष्ठापूर्ण सूर्यभक्ति का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। बाणभट्ट के अनुसार राजा प्रतिदिन त्रिकाल सन्ध्या में सूर्य की विधिपूर्वक अर्चना करते थे और ‘आदित्यहृदय’ स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करते थे, जो उनके शौर्य एवं प्रताप का मुख्य आधार था। उनके अन्य महान् ग्रन्थ कादम्बरी में भी बाणभट्ट ने प्रभात वर्णन के प्रसंग में सूर्य के उदय को एक तपस्वी के आगमन के समान पवित्र एवं वन्दनीय बताया है। उनकी विशिष्ट भाषा शैली में सूर्य के तेज को ‘प्रताप’ का पर्याय माना गया है, जो शत्रुओं के मान-मर्दन हेतु पर्याप्त है। बाणभट्ट का सूर्य-वर्णन अलङ्कारों, विशेषतः श्लेष एवं उत्प्रेक्षा से इतना सघन एवं बोझिल है कि वह साक्षात् सूर्य की प्रचण्ड दीप्ति के समान भासित होता है। उन्होंने सूर्य को ‘कमलवन-विबोधक’ कहकर उनकी सृजनात्मक एवं जीवनदायिनी शक्ति की वन्दना की है, जो जड़ जगत् में चेतना का सञ्चार करती है। बाणभट्ट की गद्य-परम्परा में सूर्य का बिम्ब एक ऐसे सार्वभौम अधिपति का है, जिसके न्यायपूर्ण शासन में अन्धकार एवं अधर्म का कोई स्थान शेष नहीं रहता। उनकी शब्दावली में सूर्य का उदय होना केवल एक खगोलीय घटना नहीं, अपितु अधर्म के विनाश एवं धर्म की पुनर्स्थापना का दिव्य उद्घोष है, जो समाज को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करता है।

महान् दार्शनिक नाटककार भवभूति ने अपने नाटकों में सूर्य को अत्यन्त गम्भीर, उदात्त एवं कारुणिक सन्दर्भों में प्रयुक्त किया है। उनके नाटक मालतीमाधवम् के नान्दीपाठ में सूर्य की स्तुति करते हुए उन्हें समस्त लोकों का कल्याण करने वाला एवं दुखों का हरण करने वाला बताया गया है। उनके सर्वश्रेष्ठ नाटक उत्तररामचरितम् में सूर्य का उल्लेख ‘कुलदेवता’ के रूप में हुआ है, जो रघुकुल के संरक्षक एवं साक्षी हैं। भवभूति ने सूर्य के ताप को जीवन के कठोर संघर्षों एवं विरह की अग्नि का प्रतीक माना है, किन्तु साथ ही उनकी शीतल रश्मियों को ज्ञान एवं शान्ति का प्रसारक भी स्वीकार किया है। उनके काव्य में सूर्य का बिम्ब केवल बाह्य प्रकृति के चित्रण तक सीमित नहीं है, अपितु वह पात्रों के आन्तरिक मनोभावों, उनकी व्यथा एवं उनके संकल्पों के साथ भी एक गहरा तादात्म्य स्थापित करता है। भवभूति की दार्शनिक दृष्टि में सूर्य काल के चक्र को अनवरत घुमाने वाले प्रधान सूत्रधार हैं, जिनके उदय और अस्त से संसार की नश्वरता एवं निरन्तरता का बोध होता है। उनकी रचनाओं में सूर्य का तेज करुणा और न्याय के अद्भुत समन्वय के रूप में परिलक्षित होता है, जो मानवीय नियति के अन्धकारपूर्ण पक्षों को अपनी आभा से आलोकित करता है। भवभूति ने सूर्य को ‘सहस्ररश्मि’ कहकर उनकी अनन्त ऊर्जा एवं सर्वव्यापकता को नमन किया है, जो सृष्टि के सञ्चालन हेतु अनिवार्य है। उनके नाटकों में सूर्य का वर्णन मानवीय जीवन की गम्भीरता एवं उदात्तता को एक नवीन आयाम प्रदान करता है, जो पाठक को आत्मचिन्तन हेतु विवश करता है।

महाकवि भारवि ने अपने अद्वितीय महाकाव्य किरातार्जुनीयम् में सूर्य के माध्यम से राजनीति, शौर्य एवं पुरुषार्थ के गम्भीर सिद्धान्तों को प्रतिपादित किया है। इस महाकाव्य के नवम सर्ग में चन्द्रोदय एवं सूर्यास्त का जो तुलनात्मक एवं अलङ्कारिक वर्णन है, वह संस्कृत साहित्य की अमूल्य एवं शाश्वत निधि माना जाता है। भारवि ने सूर्य को एक ऐसे तेजस्वी एवं प्रतापी राजा के रूप में चित्रित किया है, जो अपने प्रचण्ड तेज से शत्रुओं का दमन करता है और सम्पूर्ण पृथ्वी का पालन करता है। उनके अनुसार जिस प्रकार सूर्य अस्ताचल की ओर जाते हुए भी अपनी आभा एवं गरिमा का परित्याग नहीं करता, उसी प्रकार एक धीरोदात्त नायक विपत्ति के सघन अन्धकार में भी विचलित नहीं होता और अपने धैर्य को बनाए रखता है। भारवि की प्रसिद्ध ‘अर्थगौरव’ शैली में सूर्य के लिए प्रयुक्त विशेषण अत्यन्त अर्थपूर्ण, गम्भीर एवं मर्मस्पर्शी हैं। उन्होंने सूर्य को ‘तेजसां राशि’ कहकर उनकी असीमित शक्ति एवं प्रभाव का गुणगान किया है, जो अन्धकार रूपी अज्ञान, प्रमाद और अधर्म का समूल नाश करने में पूर्णतः समर्थ है। भारवि का सूर्य-वर्णन वीर रस की निष्पत्ति में अत्यन्त सहायक सिद्ध होता है, जहाँ सूर्य का तेज मानवीय पराक्रम एवं अदम्य साहस का प्रतीक बनकर उभरता है। उनकी दृष्टि में सूर्य का अस्त होना किसी पराजय का सूचक नहीं, अपितु एक नवीन पुनरुत्थान एवं अधिक प्रखर उदय की पूर्वपीठिका है। भारवि ने सूर्य के माध्यम से यह सन्देश दिया है कि तेजस्विता ही जीवन का वास्तविक आभूषण है, जो व्यक्ति को अमरत्व प्रदान करती है।

शिशुपालवधम् के रचयिता महाकवि माघ सूर्य-वर्णन की कला में अत्यन्त निष्णात एवं सिद्धहस्त थे। रैवतक पर्वत के भव्य वर्णन के प्रसंग में उन्होंने सूर्य और चन्द्रमा की स्थिति को एक विशाल हाथी के दोनों ओर लटकते हुए दो स्वर्ण एवं रजत घण्टों के समान बताकर अपनी विलक्षण कल्पनाशक्ति का परिचय दिया है। इस अद्भुत एवं मौलिक उपमा के कारण ही उन्हें साहित्य जगत् में ‘घण्टामाघ’ की प्रतिष्ठित उपाधि प्राप्त हुई। माघ ने सूर्य के रथ के सप्त अश्वों का वर्णन करते हुए उन्हें वेदों की सात छन्दों का प्रतीक माना है, जो सूर्य के आध्यात्मिक एवं ज्ञानपरक स्वरूप को पुष्ट करता है। उनके काव्य में सूर्य का उदय केवल एक सामान्य प्राकृतिक घटना नहीं, अपितु एक भव्य उत्सव के समान है, जो सम्पूर्ण प्रकृति को हर्षित कर देता है। माघ की परिष्कृत भाषा में सूर्य के लिए प्रयुक्त ‘सहस्रदीधिति’ शब्द उनकी अनन्त व्यापकता एवं प्रभाव को दर्शाता है। उन्होंने सूर्य के माध्यम से यह शाश्वत सन्देश दिया है कि उत्थान और पतन जीवन के अनिवार्य एवं अपरिहार्य अङ्ग हैं, जैसे सूर्य पूर्ण दीप्ति के साथ उदित होकर अन्ततः शान्तिपूर्वक अस्त होता है। माघ का सूर्य-वर्णन अलङ्कार योजना, शब्द-सौष्ठव एवं भाव प्रवणता का एक उत्कृष्ट एवं अनुकरणीय निदर्शन है। उनके श्लोकों में सूर्य की दीप्ति पाठक के हृदय में ओज, उत्साह एवं सात्त्विक चेतना का सञ्चार करती है, जो काव्य के प्रयोजन को सिद्ध करती है।

महान् पण्डित कवि श्रीहर्ष ने अपने महाकाव्य नैषधीयचरितम् में सूर्य को दार्शनिक, वैज्ञानिक एवं शृङ्गारिक दृष्टिकोण के समन्वय से देखा है। इस प्रौढ़ काव्य में सूर्य की किरणों को कामदेव के बाणों के समान तीक्ष्ण एवं मर्मभेदी बताया गया है, जो विरही जनों को उद्वेलित करती हैं। श्रीहर्ष ने सूर्य के वर्णन में श्लेष, उत्प्रेक्षा एवं अतिशयोक्ति अलङ्कारों का प्रचुर एवं पाण्डित्यपूर्ण प्रयोग किया है। उनके अनुसार सूर्य का मण्डल एक विशाल स्वर्ण पात्र के समान है, जिसमें देवताओं का अमृत भरा हुआ है और जो सम्पूर्ण विश्व को जीवन प्रदान करता है। नैषधीयचरितम् में सूर्य को ‘दिनेश’ कहकर सम्बोधित किया गया है, जो न केवल दिन के स्वामी हैं, अपितु समस्त विद्याओं एवं ज्ञान के भी परम अधिष्ठाता हैं। श्रीहर्ष की सूक्ष्म एवं वैज्ञानिक दृष्टि ने सूर्य के प्रकाश के परावर्तन, अपवर्तन एवं वर्ण-विक्षेपण जैसी भौतिक घटनाओं को भी अत्यन्त सरस एवं काव्यमयी भाषा में पिरोया है, जो उनके बहुमुखी पाण्डित्य का परिचायक है। उनके काव्य में सूर्य का बिम्ब बौद्धिक विलास, तार्किक चिन्तन एवं दार्शनिक गम्भीरता का एक अनूठा संगम है, जो सुधी पाठकों को चमत्कृत एवं मन्त्रमुग्ध करता है। श्रीहर्ष ने सूर्य को ‘अम्बरमणि’ कहकर आकाश की शोभा के रूप में प्रतिष्ठित किया है, जो ब्रह्माण्ड की सुन्दरता का केन्द्र बिन्दु है। उनकी लेखनी में सूर्य का वर्णन मानवीय बुद्धि की प्रखरता एवं प्रकृति के रहस्यों को समझने की जिज्ञासा को प्रतिबिम्बित करता है।

लौकिक साहित्य के अन्तर्गत केवल दृश्य एवं श्रव्य काव्य ही नहीं, अपितु शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक ग्रन्थों में भी सूर्य का महत्त्व अक्षुण्ण एवं सर्वोपरि रहा है। वराहमिहिर कृत बृहत्संहिता में सूर्य की प्रतिमा के लक्षण, उनके मन्दिरों के निर्माण की कला एवं उनकी उपासना की विशिष्ट विधियों का विस्तृत एवं प्रामाणिक विवरण प्राप्त होता है। वराहमिहिर ने सूर्य को ‘ग्रहराज’ स्वीकार करते हुए उनके गोचर फल, ग्रहण के प्रभाव एवं मानवीय जीवन पर उनके नियन्त्रण का गम्भीर विवेचन किया है। इसी प्रकार महान् गणितज्ञ आर्यभट्ट ने अपने ग्रन्थ आर्यभटीयम् में सूर्य को केन्द्र मानकर खगोलीय गणनाओं का एक सुदृढ़ आधार प्रस्तुत किया, जो तत्कालीन विश्व हेतु एक क्रान्तिकारी उपलब्धि थी। यद्यपि ये ग्रन्थ वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रकृति के हैं, तथापि इनकी भाषा संस्कृत होने के कारण ये लौकिक साहित्य का एक अभिन्न एवं गौरवशाली अङ्ग हैं। इन शास्त्रीय ग्रन्थों में सूर्य को ‘कालपुरुष’ का चक्षु माना गया है, जो सृष्टि के समय-निर्धारण, ऋतु-परिवर्तन एवं संवत्सर के सञ्चालन में मुख्य भूमिका निभाता है। शास्त्रीय साहित्य में सूर्य का यह स्वरूप उनके ब्रह्माण्डीय महत्त्व को वैज्ञानिक धरातल पर पुष्ट करता है और अन्धविश्वासों के स्थान पर तर्कसंगत चिन्तन को बढ़ावा देता है। सूर्य की गति, उनकी दूरी एवं उनके प्रभाव का सूक्ष्म विश्लेषण भारतीय ज्योतिष एवं खगोल शास्त्र की पराकाष्ठा को प्रदर्शित करता है, जो आज भी शोध का विषय है।

लौकिक संस्कृत साहित्य में सूर्यदेव का स्थान अत्यन्त गौरवशाली, पूजनीय एवं प्रेरणादायी रहा है। महाकवियों ने अपनी प्रखर लेखनी एवं उदात्त कल्पना से सूर्य के जिस स्वरूप को गढ़ा है, वह केवल धार्मिक आस्था या कर्मकाण्ड का विषय नहीं है, अपितु वह मानवीय चेतना के क्रमिक विकास एवं प्रकृति के प्रति अगाध अनुराग का प्रतीक है। कालिदास की कोमलता एवं प्रकृति-प्रेम से लेकर मयूरभट्ट की प्रखर ओजस्विता तक, सूर्य का प्रत्येक रूप संस्कृत साहित्य की श्रीवृद्धि करता है और उसे वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करता है। सूर्य को ‘जगत्प्रसूति’ अर्थात् जगत् के जनक मानकर कवियों ने उनके प्रति अपनी असीम कृतज्ञता ज्ञापित की है, क्योंकि उनके बिना जीवन की कल्पना भी असम्भव है। विभिन्न शताब्दियों में रचित ये कालजयी कृतियाँ इस तथ्य को प्रमाणित करती हैं कि भारतीय संस्कृति एवं साहित्य में सूर्य केवल एक खगोलीय पिण्ड या पौराणिक देवता नहीं, अपितु सम्पूर्ण जीवन-दर्शन के केन्द्र बिन्दु रहे हैं। लौकिक साहित्य में सूर्य का यह चित्रण आज भी उतना ही प्रासंगिक एवं जीवन्त है, जो हमें अन्धकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर एवं मृत्यु से अमरत्व की ओर निरन्तर गतिमान रहने की प्रेरणा प्रदान करता है। सूर्य की यह साहित्यिक यात्रा भारतीय मेधा की प्रखरता, उसके दार्शनिक गाम्भीर्य एवं प्रकृति के साथ उसके अटूट सम्बन्ध का एक जीवन्त एवं शाश्वत साक्ष्य है।

✍️ योगी अनुराग
मकर संक्रांति, २०८२

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