हरिवंश नरायण सिंह : शाह आयोग की रपट से जानें कि इमरजेंसी का मंजर कितना खौफनाक था!

इमरजेंसी की बात चलती है, तो शाह आयोग की रपट की बात सामने आती है. कल के पोस्ट में हमने उसके बारे में थोड़ी बात की. अब उस रपट के बारे में थोड़ा विस्तार से. शाह आयोग का गठन इमरजेंसी बाद बनी जनता पार्टी की सरकार में हुआ था.

28 मई 1977 को चुनाव के बाद चुनी गयी नयी सरकार ने कमीशन ऑफ इन्क्वायरी एक्ट के तहत सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे. सी. शाह के नेतृत्व में शाह आयोग गठित हुआ. इस आयोग का काम न्यायिक प्रक्रियाओं के उल्लंघन की घटनाओं की जांच करना, आपातकाल के दौरान भ्रष्टाचार, दमन, मनमानी, गिरफ्तारी, कैद में उत्पीड़न, झुग्गी झोपड़ी हटाने और शहर के सौंदर्यीकरण के नाम पर अनाधिकृत तोड़-फोड़ की जांच करना तथा संबंधित व्यक्तियों अधिकारियों की जवाबदेही तय करना था. शुरुआत में शाह कमीशन का कार्यकाल 31 दिसंबर, 1977 तक था जिसे बाद में 30 जून 1978 तक बढ़ा दिया गया.

Veerchhattisgarh

शाह कमीशन ने 31 जुलाई 1977 तक लोगों से आपातकाल के दौरान हुई अनियमितताओं, उत्पीड़न, भ्रष्टाचार की शिकायतें मांगी. 29 सितंबर 1977 से अपनी सुनवाई शुरू की. श्रीमती इंदिरा गांधी ने 1978 में एक विदेशी चैनल को दिए अपने इंटरव्यू में जस्टिस शाह पर पक्षपात का आरोप लगाया कि वे सदैव उनकी सरकार की नीतियों के विरोधी रहे. 1970 में जस्टिस शाह के नेतृत्व वाली सुप्रीम कोर्ट की 11 जजों की पीठ ने बैंक राष्ट्रीयकरण को अवैध ठहराया था. श्रीमती गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय को पक्षपात का आधार माना. श्रीमती गांधी के पक्ष द्वारा कमीशन के जांच अधिकारियों के क्रॉस-एग्जामिनेशन किए जाने की मांग की गई, जो शाह आयोग ने खारिज कर दी, क्योंकि जांच अधिकारी किसी भी मामले में किसी भी पक्ष की ओर से गवाह नहीं थे, बल्कि आयोग के अधीन काम कर रहे थे. शाह कमीशन ने तीन रिपोर्टें प्रस्तुत की. पहली दो अंतरिम रिपोर्टें 15 मई, 1978 को लोक सभा में प्रस्तुत की गईं, जबकि तीसरी रिपोर्ट 18 अप्रैल, 1979 को प्रस्तुत हुई.

श्रीमती गांधी शुरुआत से ही शाह आयोग को पक्षपात पूर्ण मानती रहीं. उन्होंने कभी भी शाह आयोग की जांच में सहयोग नहीं किया. बल्कि आयोग को अपने खिलाफ दमन के रूप में प्रस्तुत कर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की. 1980 के मध्यावधि चुनावों में जीत के बाद, उन्होंने शाह आयोग की रिपोर्ट की सभी प्रतियों को प्रतिबंधित कर, वापस उठवा लिया. लेकिन उनका यह प्रयास सफल न हो सका. डीएमके के भूतपूर्व सांसद ऐरा शिजियन को शाह आयोग की रिपोर्ट, उनके अपने पुराने दस्तावेजों में मिली. भारतीय लोकतंत्र की जो बहुमूल्य धरोहर एक दमनकारी सत्ता द्वारा जब्त कर ली गई थी, उसे उन्होंने 2010 में ‘शाह कमीशन रिपोर्ट – लॉस्ट एंड रीगेन्ड’ नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया, जिसमें उनकी संपादकीय टिप्पणियां भी हैं. शाह कमीशन की रिपोर्ट की एक-एक प्रति स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज, लंदन तथा ऑस्ट्रेलियन नेशनल लाइब्रेरी में भी उपलब्ध है.

अपनी रिपोर्ट में शाह आयोग ने जो पाया—

• जिस समय आपातकाल लागू किया गया उस समय न गृह मंत्रालय या गुप्तचर एजेंसियों द्वारा आंतरिक विक्षोभ की कोई भी रिपोर्ट नहीं दी गई थी. न ही गृहमंत्रालय की तरफ से ऐसे इंटरनल डिस्टर्बेंस (आंतरिक विक्षोभ), से निपटने की कोई तैयारी की जा रही थी.
• आपातकाल की घोषणा के लिए गृह मंत्रालय संबद्ध मंत्रालय होता है, लेकिन आपातकाल की घोषणा के पूरे घटना क्रम में न तो गृह सचिव, न कैबिनेट सचिव, न प्रधानमंत्री के सचिव ही संबद्ध किया गया. बस प्रधानमंत्री के अपर निजी सचिव आर.के.धवन ही पूरी प्रक्रिया में शामिल थे.
• और तो और गृह मंत्री श्री ब्रह्मानंद रेड्डी को भी सिर्फ सूचित ही किया गया और अंत में प्रक्रिया पूरी करने मात्र के लिए, उनसे एक सादे कागज पर एक रिपोर्ट पर दस्तख़त करवा लिए गए जो राष्ट्रपति को गृह मंत्रालय की तरफ से भेजी जाती है. अमूमन अपेक्षित था कि गृह मंत्री अपने लेटरहेड पर ऐसी रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजते हैं, सादे कागज पर नहीं.
• राष्ट्रपति को 25 तारीख की रात में आपातकाल की संस्तुति करने से पहले, संविधान के अनुच्छेद 352(3) के अनुसार कैबिनेट की बैठक नहीं की गई.
• बल्कि राष्ट्रपति से अनुच्छेद 352(1 ) के अनुसार अपनी स्व संतुष्टि के आधार पर आपातकाल की अधि सूचना पर दस्तख़त करने को कहा गया.
• जब राष्ट्रपति के तत्कालीन सचिव ने राष्ट्रपति को सही संवैधानिक स्थिति के विषय में सलाह दी कि कैबिनेट की सिफारिश जरूरी है. राष्ट्रपति के स्व—संतुष्टि पर निर्णय लेने की गुंजाइश नहीं है. फिर भी राष्ट्रपति पर दबाव बना कर आपातकाल की अधिसूचना पर दस्तख़त करवाया गया. बाद में 1 अगस्त 1975 से 38 वां संविधान संशोधन लागू किया गया. इसके तहत प्रावधान किया गया कि राष्ट्रपति और राज्यपाल द्वारा संतुष्ट होने पर किए गए फैसलों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती थी. आपातकाल की घोषणा के लिए राष्ट्रपति की संतुष्टि अंतिम मानी गई.
• आपातकाल के दौरान राजनीतिक विरोधियों ही नहीं बल्कि मंत्रियों और सांसदों के विरुद्ध भी IB के दुरुपयोग की कई जानकारियां आयोग को मिली.
• IAF के विमानों का अनधिकृत व्यक्तियों द्वारा दुरुपयोग किया गया. इसकी अनुमति तत्कालीन रक्षा मंत्री श्री बंसी लाल द्वारा दी गई.
• प्रेस सेंसरशिप का तंत्र तैयार होता इससे पहले प्रमुख समाचार पत्रों की बिजली काट दी गई.
• DAVP ने समाचार पत्रों को विज्ञापन देने में पक्षपात किया. सूचना प्रसारण मंत्री के आदेश पर समाचार पत्रों की तीन श्रेणियां बनवाई गईं – पक्ष, विपक्ष और निरपेक्ष. पक्षवाले अखबारों को सरकारी विज्ञापन दिए जाते.
• इसमें भी कांग्रेसी प्रकाशनों को बढ़ी हुई दरों पर विज्ञापन दिए जाते थे.
• संजय गांधी पर आलोचनात्मक लेख लिखने के कारण Mainstream को नोटिस भेजा गया.
• अदालतों के फैसलों और संसद की चर्चा पर भी सेंसरशिप होने लगी.
• किशोर कुमार जैसे प्रख्यात कलाकार को राजनीतिक नेतृत्व के कोप का निशाना बनना पड़ा.
• कांग्रेस कार्यकर्ताओं को AIR का अंशकालिक संवाददाता नियुक्त किया गया.
• न्यायपालिका पर दबाव बनाया गया. कुलदीप नैय्यर द्वारा सरकार के खिलाफ दायर मामले में सरकार के विरुद्ध फैसला देने वाले दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आर एन अग्रवाल का रिवर्जन कर दिया गया. न्यायमूर्ति अग्रवाल दिल्ली हायर जुड़ीशियल सर्विस से थे. 1972 में उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट का एडिशनल जज (अपर न्यायाधीश) नियुक्त किया गया. 1974 में उनकी एडिशनल जज की अवधि को दो वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया. जस्टिस अग्रवाल मीसा बेंच पर सुनवाई कर रहे थे. पत्रकार कुलदीप नैयर ने पीठ के समक्ष हैबियस कॉर्पस अपील दाखिल की थी. सुनवाई में न्यायालय ने सरकारी आदेश को निरस्त कर दिया.सरकारी आदेश की आलोचना भी की. 1975 में जब दिल्ली उच्च न्यायालय में स्थान रिक्त हुआ, तब दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा जस्टिस अग्रवाल को दिल्ली उच्च न्यायालय का नियमित न्यायाधीश बनाने की सिफ़ारिश की गयी. भारत के मुख्य न्यायाधीश और विधि मंत्रालय द्वारा भी इस सिफ़ारिश का अनुमोदन किया गया. फिर भी IB द्वारा की गयी जांच में जस्टिस अग्रवाल को आरएसएस का करीबी बताया गया. जस्टिस आर एन अग्रवाल को दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियमित नहीं किया गया बल्कि उन्हें दिल्ली के सेशन जज के तौर पर रिवर्ट कर दिया गया.
• आपातकाल के दौरान आरबीआई के गवर्नर श्री केआर पूरी की नियुक्ति मनमाने ढंग से की गई. इसके लिए आवश्यक एसीसी की अनुमति नहीं ली गयी जिसमें प्रधानमंत्री के अलावा गृह मंत्री और वित्त मंत्री होते हैं. आयोग को गृह मंत्री से राय लिए जाने का कोई सबूत नहीं मिला. वित्त मंत्री सी सुब्रमण्यम श्री पुरी, जो एलआईसी के अध्यक्ष थे, उन को आरबीआई के गवर्नर के लिए सक्षम नहीं मानते थे जिनके पास सिर्फ बीमा क्षेत्र का ही अनुभव था. श्री सुब्रमण्यम के अनुसार श्री पुरी महज एक ग्रेजुएट थे और आर्थिक संकट के उस दौर मैं आरबीआई के गवर्नर से मोनेटरी पॉलिसी और देश एवं वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरी समझ वाला व्यक्ति चाहिए था.फिर भी 18 अगस्त को 1975 श्री केआर पूरी को आरबीआई का गवर्नर सिर्फ प्रधानमंत्री की मर्जी से नियुक्त किया गया.
• इसी प्रकार एसबीआई के चेयरमेन के रूप में श्री टीआर वरदाचारी और पीएनबी के चेयरमैन के रूप मैं श्री टीआर टुली की नियुक्ति में, स्थापित प्रक्रियाओं को ताक पर रख कर, मनमानी की गई. तत्कालीन वित्त मंत्री सी सुब्रमण्यम जैसे वरिष्ठ नेता जो देश में हरित क्रांति के प्रणेता रहे, उन पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के चेयरमैन और सीनियर प्रबंधकों की नियुक्ति में दबाव डाला गया. स्टेट बैंक
के चेयरमैन की नियुक्ति में आरबीआई के गवर्नर से सलाह नहीं ली गयी.
• इसी प्रकार सरकारी सार्वजनिक क्षेत्र की पीएसयू के सीएमडी की नियुक्ति में पब्लिक एंटरप्राइजेज सिलेक्शन बोर्ड (पीईएसबी) द्वारा प्रस्तावित पैनल की जगह, PESB से खारिज किए गए उम्मीदवारों को नियुक्त किया गया.
• एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइन्स के बोर्ड के गठन में स्थापित प्रक्रियाओं की अनदेखी कर, अनियमितताएं की गईं.
• इंडियन एयरलाइन्स द्वारा तीन बोइंग विमानों की खरीद पर पब्लिक सेक्टर इनवेस्टमेंट बोर्ड की अनुमति नहीं थी, न ही नागर विमानन मंत्रालय के सचिव की अनुमति थी, फिर भी खरीद को सीधे मंत्री द्वारा आरके धवन के कहने पर अनुमोदित कर दिया गया. खरीद में राजीव गांधी की भूमिका भी सवालों के कटघरे में आई. उन्हें विमान खरीद के कागजात दिखाए गए जबकि वे महज पायलट थे.
• नेशनल हेराल्ड की एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड को पीएनबी द्वारा ओवरड्राफ्ट की सुविधा दी गई. बिना कोई आवश्यक जांच किए.
• सीबीआई का खुलेआम दुरुपयोग किया गया. यहां तक कि वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के उन चार अधिकारियों को सीबीआई द्वारा फर्जी मामलों में फंसाया गया जो मारुति कंपनी की जांच कर रहे थे.
• इसी प्रकार सीबीडीटी के अध्यक्ष एसआर मेहता पर मारुति की जांच में टाल—मटोल करने का आरोप सिद्ध हुआ, जिसमें मारुति कंपनी के शेयरों में बेनामी निवेश किए जाने की जांच की जानी थी.
• मिसा जैसे दमनकारी कानूनों का दुरुपयोग राजनैतिक विरोधियों के खिलाफ खुल कर किया गया. जॉर्ज फर्नांडिस के छोटे भाई लॉरेंस फर्नांडिस को कर्नाटक से पकड़ा गया और शारीरिक प्रताड़ना दी गई.
• वीरेंद्र कपूर, (आरएसएस के कार्यकर्ता) मुरली डालमिया (द ट्रिब्यून के विशेष संवाददाता) एमएल काक को बंदी बनाया गया.
• राजनैतिक नेताओं को कहने को प्रिवेंटिव डिटेंशन में रखा गया जिससे उन्हें सिर्फ प्रतिबंधित किया जा सके लेकिन असल में उनकी गिरफ्तारी में सज़ा और उत्पीड़न हुआ.
• इसमें खासकर दिल्ली पुलिस और दिल्ली प्रशासन की भूमिका पर शाह आयोग ने खास सवाल खड़े किए. एक केंद्र शासित प्रदेश होते हुए भी दिल्ली प्रशासन केंद्रीय गृह मंत्रालय पर भारी पड़ता था.
• शहर सौंदर्यीकरण के नाम पर दिल्ली की विभिन्न बस्तियों जैसे तुर्कमान गेट, अंधेरिया मोड़, करोलबाग, भगत सिंह मार्केट, कापसहेडा बॉर्डर जैसी जगहों पर तोड़—फोड़ की गई, विरोध का नृशंसता से दमन किया गया. तुर्कमान गेट पर गोली चलाई गई. लोगों को मीसा में बंद कर दिया गया
• नवीन चावला, डीआईजी पी.एस. भिंडर, के.एस. बाजवा तथा उपराज्यपाल जगमोहन की भूमिका सवालों के घेरे में थी.

– श्री हरिवंश नरायण सिंह,राज्यसभा के उपसभापति के पोस्ट से साभार।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *